आचार्य श्री मतलब विद्यासागर—
आचार्य श्री हमारे केवल श्रद्धा के केंद्र नहीं थे, वे हमारे गौरव, संस्कार और स्वाभिमान के सजीव स्तंभ थे। वर्षों तक उनकी वंदना का जो सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ, वह केवल चरण-स्पर्श का अवसर नहीं था—वह आत्मा को दिशा देने वाली दिव्य शिक्षा का प्रवाह था। उन्होंने हमें केवल धर्म का उपदेश नहीं दिया, बल्कि जीवन जीने का साहस, राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व और मानवीयता के प्रति संवेदना भी सिखाई।
उन्होंने अपने तप, त्याग और तेज से यह सिद्ध किया कि साधु केवल मठों और मंदिरों तक सीमित नहीं होता—वह समाज का मार्गदर्शक, राष्ट्र का नैतिक प्रहरी और युग का जागरण-पुरुष होता है। धर्म के उत्थान से लेकर पर्यावरण संरक्षण तक, गौ-सेवा से लेकर मानवीय मूल्यों के पुनर्जागरण तक, उनके द्वारा किए गए कार्य ऐतिहासिक थे, कालजयी थे, और कल्पनाओं से भी परे थे।
आज वे देह से भले ही हमारे बीच उपस्थित न हों, पर उनके विचार, उनकी वाणी, उनका तप और उनका राष्ट्र-स्वप्न आज भी हमारे भीतर धड़क रहा है। वे शरीर से गए नहीं—वे संकल्प बनकर हमारे भीतर जागे हैं।
अब समय शोक का नहीं, संकल्प का है।
अब समय स्मरण का नहीं, सृजन का है।
हमें उनके द्वारा प्रारंभ किए गए प्रत्येक कार्य को अंजाम तक पहुँचाने का पुरुषार्थ करना होगा। “भारत को भारत” बनाने की दिशा में जो चिंतन उन्होंने दिया—स्वदेशी, संस्कार, संयम और संस्कृति का जो सूत्र उन्होंने पकड़ाया—उसे पुनः गति देना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
हमें माननीय राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अन्य सभी जिम्मेदार व्यक्तित्वों से एक स्वर में आग्रह करना चाहिए कि राष्ट्र की आत्मा को उसके वास्तविक नाम और स्वाभिमान के साथ प्रतिष्ठित किया जाए। भारत केवल एक भूभाग नहीं—यह एक चेतना है, एक संस्कृति है, एक सनातन पहचान है।
यदि हम सच में उन्हें गुरुश्रेष्ठ मानते हैं, तो उनके स्वप्नों को शासन और समाज दोनों के केंद्र में स्थापित करना होगा। यही उनकी विनयांजलि होगी, यही हमारी कृतज्ञता होगी, यही हमारी निष्ठा की परीक्षा होगी।
जय हो गुरुश्रेष्ठ!
आप जैसा कोई नहीं—और आपका प्रकाश कभी क्षीण नहीं होगा।
योगेश जैन संवाददाता टीकमगढ़












