णमोकार तीर्थं : पर भक्त से भगवान बनने का महा-महोत्सव

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महावीर दीपचंद ठोले
छत्रपति संभाजीनगर
महामंत्री, श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा (महाराष्ट्र प्रांत)
📞 75880 44495
प्रस्तावना
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में जैन धर्म एक प्राचीन, वैज्ञानिक तथा आत्म-केंद्रित दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित है। यह दर्शन केवल ईश्वर-आराधना तक सीमित नहीं, बल्कि आत्म-परिष्कार, चरित्र-निर्माण और मोक्ष-मार्ग का एक समग्र विज्ञान है। तीर्थंकरों के जीवन-आदर्शों को जन-मानस तक प्रभावी रूप से पहुँचाने के लिए जैनाचार्यों ने विविध अनुष्ठानों और महोत्सवों की परंपरा विकसित की, जिनमें पंचकल्याणक महोत्सव का स्थान सर्वोपरि है।
पंचकल्याणक महोत्सव तीर्थंकर भगवान के जीवन की पाँच परम कल्याणकारी घटनाओं—गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण—का विधिपूर्वक, प्रतीकात्मक और सामूहिक उत्सव है। यह महोत्सव केवल भक्ति और आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जैन दर्शन के मूल तत्त्वों—अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अनेकांत और आत्म-शुद्धि—को सामाजिक जीवन में प्रतिष्ठित करने का प्रभावी माध्यम है।
पंचकल्याणक की अवधारणा
‘कल्याणक’ शब्द का अर्थ है—कल्याणकारी, मंगलकारी और आत्मोद्धारक। ‘पंच’ का तात्पर्य पाँच से है, किंतु भावार्थ में यह “सर्वकल्याणकारी” का द्योतक भी है। तीर्थंकरों के जीवनकाल में घटित होने वाली ये पाँच घटनाएँ केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत के कल्याण का कारण बनती हैं। शास्त्रों में कहा गया है—
“कल्याणं करोति इति कल्याणकम्”
अर्थात् जो प्राणीमात्र के कल्याण का कारण बने, वही कल्याणक है।
वर्तमान पंचम काल में तीर्थंकरों का प्रत्यक्ष अस्तित्व नहीं है। वे कर्मातीत, देहातीत होकर सिद्ध अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं, इसलिए जैन परंपरा में उनकी प्राण-प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि बिंब-स्थापना की जाती है। इस बिंब-स्थापना के माध्यम से तीर्थंकरों के गुण—वैराग्य, वीतरागता, करुणा और सर्वज्ञता—मूर्ति में आरोपित किए जातेहैं।विधि-विधान, पूजा-अनुष्ठान और मानसिक साधना के द्वारा जब यह स्थापना पूर्ण होती है, तब वह मूर्ति केवल शिलाखंड न रहकर भगवत्ता का प्रतीक बन जाती है।
तीर्थंकरत्व : मानवता का परम उत्कर्ष
जैन परंपरा के अनुसार तीर्थंकर कोई अनादि-सिद्ध परमात्मा नहीं होते। वे अनेक जन्मों की साधना, तप, त्याग और आत्म-संयम के बल पर मानवता के चरम उत्कर्ष को प्राप्त करते हैं। शास्त्रों में वर्णित दस भवों की विशिष्ट साधना यह सिद्ध करती है कि साधारण जीव भी निरंतरआत्म-पुरुषार्थ द्वारा परमात्मा बन सकता है।
इसी सत्य को पंचकल्याणक महोत्सव सजीव करता है। यही इसका मूल संदेश है
“भक्त से भगवान बनने की यात्रा।”
पंचकल्याणक में प्रतिष्ठा :आत्म-परिवर्तन की दिव्यप्रक्रिया
पंचकल्याणक महोत्सव में होने वाली प्रतिष्ठा केवल मूर्ति-स्थापना नहीं, बल्कि प्रतिष्ठित बनने की साधना है। जैन दर्शन का स्पष्ट सिद्धांत है—जो स्वयं प्रतिष्ठित नहीं है, वह दूसरों की प्रतिष्ठा कैसे कर सकता है। इसी कारण पंचकल्याणक की प्रक्रिया में सर्वप्रथम इन्द्रों की प्रतिष्ठा की जातीहै।मंत्र-संस्कारों के माध्यम से जब मनुष्य इन्द्र-भूमिका में प्रतिष्ठित होता है, तब उसमें देव-गुणों का आव्हान किया जाता है। उसका नाम, गोत्र और भूमिका परिवर्तित हो जाती है। वह लौकिक सीमाओं से ऊपर उठकर देव-भाव में प्रतिष्ठित होता है—जहाँ सूतक-पातक का स्पर्श नहीं, भूख-प्यास का अनुभव नहीं और शारीरिक दुर्बलताएँ अप्रभावी हो जाती हैं। यह कोई चमत्कार नहीं, बल्किचेतनापरिवर्तन की वैज्ञानिक आध्यात्मिक प्रक्रिया है।पंचकल्याणक न पूर्णतः वास्तविक है, न काल्पनिक—यह वास्तविकता की प्रतीकात्मक पुनर्रचना है। यह “असल की नकल” होते हुए भी आत्मा के ब्रेन-वाश की प्रक्रिया है, जहाँ मोह, कषाय और विकारों के संस्कार धुलते हैं। इसी प्रक्रिया में भक्त से भगवान बनने की यात्रा प्रारंभ होती है। शास्त्रों में वर्णित है कि इस क्रिया को देखकर असंख्यात देवों को सम्यग्दर्शन की प्राप्ति होती है और सौधर्म इन्द्र का मुकुट भी श्रद्धा से झुक जाता है।
पंचकल्याणक : आत्मा से परमात्मा बनने की प्रयोगशाला
पंचकल्याणक की समस्त क्रिया जगत-कल्याण के लिए होती है। यह पुण्य का अवसर प्रदान करती है, धार्मिक वातावरण का निर्माण करती है और साधकों के परिणामों को सफल बनाती है। यह महोत्सव आत्मा को परमात्मा बनाने की प्रयोगशाला के रूप में कार्य करता है।
यह पामर से परमेश्वर बनने का पथ है, कंकर से शंकर बनने की साधना है, नर से नारायण बनने की प्रक्रिया है। यहाँ संस्कारों और संस्कृति की रक्षा होती है, पूज्य बनने की कला सिखाई जाती है और आत्मा में गोता लगाकर कषायों की गाँठ खोलने का दुर्लभ अवसर प्राप्त होता है।पंचकल्याणक में आचार्यों, मुनिराजों और आर्यिकाओं के कल्याणकारी प्रवचन समाज में नैतिकता और संस्कारों का संचार करते हैं। युवावर्ग को वैराग्य, संयम और आत्म-चिंतन की प्रेरणा मिलती है।
णमोकार तीर्थ पर पंचकल्याणक महामहोत्सव
इन्हीं उच्च आध्यात्मिक उद्देश्यों को साकार करने हेतु णमोकार तीर्थ पर पंचकल्याणक महामहोत्सव 6 फरवरी से 13 फरवरी 2026 तक चादवड (नासिक) के मालसाने ग्राम में संपन्न हो रहा है। यह पाषाण से परमात्मा और भक्त से भगवान बनने का अंतरराष्ट्रीय महामहोत्सव, समग्र वैश्विक मानवता के नैतिक और आत्मिक उत्थान के लिए समर्पित है।
गणधराचार्य कुंथुसागर जी के विशाल संघ के सान्निध्य में, णमोकार तीर्थ के प्रेरणास्रोत आचार्य देवनंदी जी की प्रेरणा से तथा मुनिश्री अमरकीर्ति जी एवं अमोघकीर्ति जी के कुशल नेतृत्व में, शताधिक आचार्य, मुनिराज और आर्यिकाओं की उपस्थिति में यह विराट आयोजन हो रहा है।तीस एकड़ भूमि पर नवनिर्मित णमोकार तीर्थ में विश्व का 108 फीट ऊँचा समवशरण मंदिर, 32 फीट ऊँची भगवान चंद्रप्रभु की मनोहारी प्रतिमा, त्रिकाल चौबीसी के 24 जिनालय, 31 फीट ऊँची भगवान नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर की प्रतिमाएँ, पंच परमेष्ठी की दिव्य प्रतिमाएँ तथा चार मानस्तंभ विराजमान हैं। अत्याधुनिक ध्वनि-प्रकाश और दृश्य प्रभावों से समवशरण को जीवंत अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा। साथ ही विशाल ग्रंथ-भंडार, निर्माणाधीन णमोकार नॉलेज सिटी, नौका-विहार और मिनी ट्रेन जैसी सुविधाएँ भी उपलब्ध होंगी।ऐसी अनेक योजनाए आकल्पित है।
उपसंहार
यह महाराष्ट्र का सौभाग्य है कि उसकी पावन भूमि पर जन-जन के कल्याण हेतु अत्याधुनिक, अलौकिक ऐसा विराट तीर्थ विकसित हो रहा है, जो जैन धर्म की ध्वजा को युगों तक लहराता रहेगा। यह पंचकल्याणक महोत्सव केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा को तीर्थंकर-पद की दिशा में अग्रसर करने वाला महा-संस्कार है।
जब हम पंचकल्याणक में पाषाण को भगवान बनते देखते हैं, तब हमें यह विश्वास दृढ़ करना चाहिए कि अपने संस्कारों को जाग्रत कर, धर्म के मर्म
को समझकर, हम भी भक्त से भगवान बनने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। आज नहीं तो कल—हमारी भगवत्ता सुनिश्चित है।अतः प्रत्येक श्रावक श्राविका को जीवन मे एकबार ईस तीर्थ के दर्शन कर पुण्यार्जन करना चाहिए।
जयजिनेद्र, कृपया यह आलेख पत्रीका प्रकाशित कर उपकृत करे ।धन्यवाद।
महावीर ठोले
छत्रपतीसंभाजीनगर

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