अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट……………………………विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि जो निरंजन है वह परमात्मा है। समस्त द्रव्य कर्म भाव कर्म, नोकर्म से रहित होते हैं परमात्मा।
परमात्मा का गुणधर्म
आकाश में अनंत गुण है वैसे ही परमात्मा में अनंत गुण है। बहिरात्मा देह को आत्मा मानता है वह भी मिथ्या है। जो परम सत्य आत्मतत्व को नहीं जानता है वह बहिरात्मा है। जो शरीर दिखाई देता है सुख-दुख होता है, जो इंद्रियों से दिखाई देता है उसे सत्य मानना बहिरात्मापना है। जीव जिस पर्याय में जन्म लेता है उसे ही स्व स्वरूप जान लेता है। मनुष्य देह में जब मिथ्यादृष्टि होता है तो वह मनुष्य देह को, तिर्यच पर्याय में तिर्यचदेह को, देव पर्याय में देव शरीर को ही शरीर मानता है नारकी पर्याय में नारकी शरीर को ही मै मानता है।
सत्य व तथ्य में अंतर है। अन्य सभी ज्ञान से आध्यात्मिक ज्ञान श्रेष्ठ है आत्मा अनंत शक्ति संपन्न है। अनंतानंत धी, शक्ति संपन्न हरजीव है। स्व संवेदन ज्ञान आध्यात्मिक अनुभव ज्ञान श्रेष्ठ ज्ञान है।
विभावो से जब तक जीव स्वतंत्र नहीं होता तब तक जीव परतंत्र ही रहता है। मोह अंधविश्वास क्रोध मान, माया, लोभ के कारण जीव अपनी आत्मा का दर्शन, ज्ञान नहीं कर सकता है। मोह, अंधविश्वास ही मिथ्यात्व है। गहन करणानुयोग में गणित से वर्णन है। परम श्रेष्ठ, ज्येष्ठ विषय मिथ्या दृष्टि का है इसको जानने के लिए 50,60 ग्रंथ बड़े-बड़े हैं जिन्हें समझना होगा।
गोमटसार ग्रंथ की 18 नंबर गाथा में मिथ्या दृष्टि का वर्णन है कि जो मिथ्या दृष्टि होते हैं वह सर्वज्ञ की वाणी पर भी विश्वास नहीं करते हैं जैसे मरीचि कुमार। व्यवहार में भी जो स्वार्थी मोही, रूढिवादी सत्य तथ्य को भी नहीं मानते हैं।
स्पर्श रस गंध, वर्ण का जो ज्ञान इंद्रियों से होता है वह परम सत्य नहीं है। जो सर्वज्ञ ने नहीं बोला निषेध किया है उसको भी मिथ्या दृष्टि मानता है। सर्वज्ञ की वाणी के एक पद को भी एक अक्षर को भी गलत मानना मिथ्यात्व है। सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित आगम ही परम सत्य है प्रवचन है।
अनंत काल तक यह जीव सम्यक दृष्टि नहीं बन पाया। सम्यक दृष्टि बने बिना धर्म प्रारंभ ही नहीं होता। धार्मिक पर्व शांति संगठन एकता के लिए है परंतु इसी में दंगा लड़ाई झगड़ा अधिक है क्योंकि धर्म को नहीं जानते हैं।
जो मतिज्ञान,श्रुत ज्ञान से, लौकिक ज्ञान से स्वार्थ पूर्ण जानते हैं उसको ही स्वच्छंद होकर मनमानी रूप में जानते हैं। विभ्रम, संशय से जानकर मनमानी करते हैं।
हितोपदेशी आप्त, गुरु जो बताते हैं वह मानना चाहिए।
मोहनिय कर्म के उदय से जीव विपरीत श्रद्धान, विपरीत भाव करता है। मिथ्यात्व कर्म के उदय होने पर जीव मिथ्यात्व का गुलाम हो जाता है। इंद्रियां,मन आदि उसके वश में नहीं रहता है। विवशता से जीव अनेक पाप करता है। परंतु विवशता को छोड़ना त्यागना ही धर्म है।
मुनि श्री सुयिज्ञ सागर जी नेआचार्य श्री द्वारा रचित कविता
द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारियां श्रीमती विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।
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