भक्ति में झूमे इंद्र–इंद्राणी, श्रीपाल-मैनासुंदरी नाटिका ने बाँधा समां
ललितपुर। श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र गिरारगिरी जी में 16 से 23 जनवरी 2026 तक आयोजित 25 मंडलीय 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान, वार्षिक मेला, विश्व शांति महायज्ञ एवं भव्य रथोत्सव अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के वातावरण में भव्य रूप से सम्पन्न हो रहा है। यह विराट धार्मिक आयोजन आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री 108 समत्वसागर जी महाराज एवं मुनि श्री 108 शीलसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में सम्पन्न हो रहा है।
प्रचारमंत्री डॉ सुनील संचय ने बताया कि बुधवार को आयोजित 25 मंडलीय सिद्धचक्र महामंडल विधान के अंतर्गत 128 अर्घ्य विधानों के सौभाग्यशाली पात्रों द्वारा भक्ति-नृत्य के साथ भावपूर्ण अर्घ्य समर्पित किए गए। विधान स्थल पर इंद्र-इंद्राणी स्वरूपों में सजे पात्रों ने सिद्धों की आराधना करते हुए ऐसा भावमय वातावरण रचा कि सम्पूर्ण परिसर सिद्धाराधना की दिव्य भक्ति बयार से ओत-प्रोत हो उठा।
इस अवसर पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री समत्वसागर जी महाराज ने कहा—सिद्धचक्र महामंडल विधान केवल बाह्य क्रिया नहीं, अपितु आत्मशुद्धि की साधना है। जब आत्मा राग-द्वेष से ऊपर उठकर सिद्धों के गुणों का चिंतन करती है, तभी वास्तविक सिद्धाराधना होती है। अर्घ्य समर्पण का भाव हमें त्याग, समर्पण और वैराग्य की ओर प्रेरित करता है।
मुनिश्री ने आगे कहा कि—सिद्धों की आराधना से जीवन में सम्यक् दृष्टि का उदय होता है। जो व्यक्ति अपने भीतर के विकारों का क्षय कर लेता है, वही सच्चे अर्थों में धर्म की आराधना करता है।
सिद्धों की आराधना हमें यह प्रेरणा देती है कि जैसे सिद्ध परम पद को प्राप्त हुए, वैसे ही प्रत्येक जीव अपने पुरुषार्थ से मोक्षमार्ग पर अग्रसर हो सकता है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मकल्याण है, न कि केवल बाह्य आडंबर।
श्रीपाल-मैनासुंदरी नाटिका ने छोड़ी गहरी छाप :
महोत्सव के अंतर्गत मंच कलाकार चक्रेश सोजना के कुशल संचालन में श्रीपाल-मैनासुंदरी नाटिका की भव्य एवं भावपूर्ण प्रस्तुति दी गई। नाटिका में मैनासुंदरी के त्याग, पतिव्रत धर्म, अटूट श्रद्धा और धर्मनिष्ठ जीवन का प्रभावशाली चित्रण किया गया।
कलाकारों ने संवाद, संगीत एवं भाव-भंगिमाओं के माध्यम से यह संदेश दिया कि धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलकर ही जीवन में सच्चा कल्याण संभव है। नाटिका के मार्मिक दृश्यों को देखकर अनेक श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। पूरा पंडाल करतल ध्वनि से गूंज उठा।
प्रातः मंगलाष्टक के पश्चात श्रीजी का अभिषेक एवं शांतिधारा सम्पन्न हुई। मूलनायक आदिनाथ भगवान की विधिवत पूजा-अर्चना के उपरांत सिद्धाराधना में पात्रों द्वारा अर्घ्य समर्पित किए गए।
चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन के पश्चात पुण्यार्जक परिवारों द्वारा मुनिराज का पाद प्रक्षालन किया गया।
25 मंडलीय पुण्यार्जक परिवारों में—शांतकुमार जैन परिवार, सेठ हरिश्चंद्र जैन, विनय जैन, मुकेश कुमार जैन, चक्रेश जैन, राजेंद्र कुमार जैन, प्रदीप कुमार जैन (खुटगुआ वाले), सेठ संदीप कुमार जैन (गिरार), राजेंद्र कुमार जैन (अदावन वाले), मिट्ठूलाल जैन, सिंघई कैलाशचंद्र जैन (रमगढ़ा), सुनील जैन, दीपचंद्र जैन, राजकुमार जैन, श्रीमती चंदा जैन, जिनेंद्र जैन (मड़ावरा), कमल कुमार जैन ‘मोनू’ मड़ावरा, कमलेश जैन, संतोष कुमार जैन, सेठ शांतकुमार जैन, मनीष जैन (चक्की वाले), डॉ. कमल जैन (बरायठा) सहित कुल 25 सौभाग्यशाली परिवारों ने भक्ति एवं श्रद्धा के साथ अर्घ्य समर्पित किए।
विधान की समस्त विधियाँ विधानाचार्य पं. मनोज शास्त्री (बगरोही) एवं पं. देवेंद्र शास्त्री (मड़ावरा) व विकर्ष शास्त्री द्वारा शास्त्रोक्त विधि-विधान से सम्पन्न कराई गईं।
महोत्सव में गिरारगिरी कमेटी अध्यक्ष चक्रेश जैन, महामंत्री प्रदीप जैन (मड़ावरा), कोषाध्यक्ष मुकेश सिंघई, आयोजन समिति अध्यक्ष अनिल जैन, महामंत्री राजेश ‘रज्जू’ मड़ावरा, कोषाध्यक्ष दीपचंद्र जैन, अभिषेक जैन ‘दीपू’, अजित जैन, त्रिलोक जैन ,सुनील जैन मोनू सहित अनेक पदाधिकारियों ने अतिथियों का स्वागत किया।






















