(गणतंत्र दिवस पर विशेष : जानें दुनिया के पहले गणतंत्र के बारे में) वैशाली : विश्व गणतंत्र की प्रथम पाठशाला

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भारत का गणतंत्र केवल 26 जनवरी 1950 से जुड़ी एक संवैधानिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और राजनीतिक चेतना की सहस्राब्दियों पुरानी यात्रा का जीवंत प्रमाण है। आज जब भारत 77वां गणतंत्र दिवस मना रहा है, तब यह स्मरण करना अत्यंत आवश्यक है कि लोकतांत्रिक गणतंत्र की अवधारणा का प्रथम प्रकाश इसी पुण्य भूमि भारत से उदित हुआ था।
वैशाली : विश्व का प्रथम गणराज्य
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार दुनिया का पहला गणराज्य वैशाली था, जो वर्तमान बिहार राज्य में स्थित था। ईसा से लगभग 2600 वर्ष पूर्व वैशाली में स्थापित गणतांत्रिक व्यवस्था ने संपूर्ण विश्व को लोकतंत्र का मार्ग दिखाया। यह नगर वज्जी महाजनपद की राजधानी था और यहां लिच्छवी गणराज्य का संचालन होता था।
आज जिन उच्च सदन और निम्न सदन की व्यवस्थाओं को आधुनिक लोकतंत्र की पहचान माना जाता है, उनका प्रारंभिक स्वरूप भी वैशाली गणराज्य में देखने को मिलता है। यहां छोटी-छोटी समितियां गठित थीं, जो जनता के हित में नियम और नीतियां निर्धारित करती थीं।
भारत : लोकतंत्र की जननी :
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए कहा था कि “भारत लोकतंत्र की जननी है।” यह कथन केवल भावनात्मक गर्व नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य पर आधारित है। भारत में लोकतंत्र कोई आयातित विचार नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की आत्मा रहा है।
यूरोप और अमेरिका की आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणालियाँ भी मूल रूप से उन्हीं सिद्धांतों को अपनाती हैं, जिनका प्रयोग वैशाली में सदियों पहले किया गया था। इसी कारण कुछ इतिहासकार वैशाली को ‘गणतंत्र का मक्का’ भी कहते हैं।
ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक वैभव की धरा : वैशाली-
वैशाली केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, धार्मिक और कलात्मक दृष्टि से भी अत्यंत समृद्ध रही है। यहां के चेचर (श्वेतपुर) क्षेत्र से प्राप्त मूर्तियाँ और सिक्के इसके पुरातात्विक महत्व को प्रमाणित करते हैं। वैशाली अपने उत्कृष्ट हस्तशिल्प के लिए भी विख्यात रही है।
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने वैशाली की गरिमा को इन शब्दों में नमन किया है—
वैशाली जन का प्रतिपालक, विश्व का आदि विधाता।
जिसे ढूंढता विश्व आज, उस प्रजातंत्र की माता॥
रुको एक क्षण पथिक,इस मिट्टी पे शीश नवाओ।
राज सिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ।
महावीर, बुद्ध और वैशाली : वैशाली जैन और बौद्ध परंपरा का अत्यंत पावन केंद्र है। यह भगवान महावीर की जन्मभूमि है और भगवान बुद्ध का यहां तीन बार आगमन हुआ।
प्राचीन गणतंत्र ‘वैशाली’ और महावीर स्वामी :  विश्‍व को सर्वप्रथम गणतंत्र का पाठ पढ़ने वाला स्‍थान वैशाली ही है। आज वैश्विक स्‍तर पर जिस लोकतंत्र को अपनाया जा रहा है वह यहां के लिच्छवी शासकों की ही देन है। लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व नेपाल की तराई से लेकर गंगा के बीच फैली भूमि पर वज्जियों तथा लिच्‍छवियों के संघ (अष्टकुल) द्वारा गणतांत्रिक शासन व्यवस्था की शुरुआत की गयी थी। यहां का शासक जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता था।
दरअसल वैशाली नगर वज्जी महाजनपद की राजधानी थी। महाजनपद का मतलब प्राचीन भारत के शक्तिशाली राज्यों में से एक होता था। ये क्षेत्र प्रभावशाली था अपने गणतांत्रिक मूल्यों की वजह से। वैशाली गणराज्य को लिच्छवियों ने खड़ा किया था।
ऐतिहासिक साहित्य से ज्ञात होता है कि भगवान महावीर के काल में अनेक गणराज्य थे। तिरहुत से लेकर कपिलवस्तु तक गणराज्यों का एक छोटा सा गुच्छा गंगा से तराई तक फैला हुआ था। गौतम बुद्ध शाक्यगण में उत्पन्न हुए थे। लिच्छवियों का गणराज्य इनमें सबसे शक्तिशाली था, उसकी राजधानी वैशाली थी। लिच्छवी संघ नायक महाराजा चेटक थे। महाराजा चेटक की ज्येष्ठ पुत्री का नाम ‘प्रियकारिणी त्रिशला’ था जिनका विवाह वैशाली गणतंत्र के सदस्य एवं क्षत्रिय ‘कुण्डग्राम’ के अधिपति महाराजा सिद्धार्थ के साथ हुआ था और इन्हीं के यहाँ 599 ईसापूर्व चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन बालक वर्धमान (महावीर स्वामी) का जन्म वज्जिकुल में हुआ  जिसने अनेकान्त-स्याद्वाद सिद्धांत के माध्यम से पूरे विश्व को अच्छे लोकतंत्र की शिक्षा प्रदान कर एक नई दिशा प्रदान की ।
भगवान महावीर के सिद्धांत, शिक्षाएं, संविधान आज भी अत्यंत समीचीन और प्रासंगिक हैं।
गणतंत्र दिवस हमारे संविधान में संस्थापित स्वतंत्रता, समानता, एकता, भाईचारा और सभी भारत के नागरिकों के लिए न्याय के सिद्धांतों को स्मरण और उनको मजबूत करने का एक उचित अवसर है, क्योंकि हमारा संविधान ही हमें अभिव्यक्ति की आजादी देता है।
वैशाली गणराज्य और आधुनिक गणतंत्र :
वैशाली गणराज्य में शासन जनता के प्रतिनिधियों द्वारा संचालित होता था। उस समय के ‘गण’ आज के पार्षदों, विधायकों और सांसदों के समान थे। लोग अपनी समस्याएं गणों तक पहुंचाते थे और वे गणसभा में जनहित के निर्णय लेते थे।
आज के गणतंत्र और वैशाली के गणराज्य में भले ही संरचनात्मक अंतर हो, परंतु मूल विचार— जनसहभागिता, प्रतिनिधित्व और उत्तरदायित्व— वही है।
वैश्विक समाज के लिए प्रेरणादायक भारतीय लोकतंत्र :
लोकतंत्र आज केवल शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन बन चुका है। सहभागिता, पारदर्शिता, समानता, बंधुता और जवाबदेही इसके मूल तत्व हैं। भारत की त्रिस्तरीय शासन प्रणाली और विकेंद्रीकरण की अवधारणा इसे और अधिक सशक्त बनाती है।
हमारे पूर्वजों ने जो लोकतांत्रिक विरासत हमें सौंपी है, उसे सुरक्षित रखना और भावी पीढ़ी तक पहुंचाना हम सभी का नैतिक दायित्व है।
गणतंत्र दिवस , संकल्प का पर्व :
गणतंत्र दिवस हमें संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता, न्याय, एकता और भाईचारे के मूल्यों को स्मरण कराने का अवसर देता है। इस पावन अवसर पर प्रत्येक नागरिक को संविधान और गणतंत्र के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहरानी चाहिए तथा शिक्षा, सद्भाव और पारदर्शिता को सुदृढ़ करने का संकल्प लेना चाहिए। अगर देश के नागरिक संविधान में प्रतिष्ठापित बातों का अनुसरण करेंगे तो इससे देश में अधिक लोकतांत्रिक मूल्यों का उदय होगा।
— डॉ. सुनील जैन संचय, ललितपुर
पता :
874/1, गांधीनगर, नई बस्ती,
ललितपुर (उ.प्र.)
 ई-मेल : Suneelsanchay@gmail.com

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