विश्व- धरा पर सर्वश्रेष्ठ कला”अध्यात्म-विद्या”- आचार्य विशुद्ध सागर

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दिगम्बर जैनाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने ऋषभ सभागार मे धर्मसभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि- “विश्व वसुन्धरा पर कोई सर्व-श्रेष्ठ विद्या है, तो वह ‘अध्यात्म-विद्या’ है। सम्पूर्ण कष्टों का समाधान करने वाली विद्या ‘अध्यात्म’ है। अध्यात्म परम-शांति का उपाय है। अध्यात्म के आश्रय से ही उत्कर्ष होता है। बहत्तर कलाओं में प्रधान ‘अध्यात्म-विद्या’ है। आत्मा ही परम-शरण है। आत्म- कल्याण के लिए अन्तर्मुखी दृष्टि आवश्यक है।”
क्रोध, मान, माया और लोभ के वशीभूत मानव अशुभ, कष्ट्पद, अनर्थकारी पापों में प्रवृत्त होता है। आत्म-शांति के लिए कषायों से विराम लेना जरूरी है। कषाय शांत होते ही कल्याण-मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
जैसे बीज के अभाव में वृक्ष, पुष्प, पत्र और फल नहीं होते, उसी प्रकार आस्था, विश्वास, समर्पण, वात्सल्य एवं सम्यक ज्ञान के अभाव में चारित्र नहीं होता है। चारित्रिक उन्नति चाहिए, सिद्धि-प्रसिद्धि चाहिए तो सम्यक- श्रधान का होना अनिवार्य है। सम्युक्-श्रधान से ही सुख, शांति, आनन्द का पवित्र-मार्ग प्रारम्भ
होता है। श्रेष्ठ- ध्यान के लिए विरक्ति अनिवार्य अंग है। सज्जन- स्वभावी, मधुर-भाषी, शाकाहारी, विवेकी विनयशील ही ध्यान-साधना में प्रविष्ट हो सकता है। ध्यान से सिद्धि होती है। ध्यान जैन-दर्शन की श्रेष्ठ साधना है। ध्यान मुक्ति का उपाय है। मुनियों की प्रधान -साधना ध्यान और अध्ययन है। श्रावक दान और पूजा कर अपने शांति-मार्ग का उद्योतन करता है।
सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया।
सभा मे विनोद जैन एडवोकेट, सुरेश जैन, राजेश भारती, मनोज जैन, पुनीत जैन, अशोक जैन, राकेश जैन,अतुल जैन, आलोक मित्तल,आलोक सर्राफ आदि उपस्थित थे। अतुल जैन बुढ़पुर मीडिया प्रभारी

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