स्वस्थ्य और सुखी जीवन के अनमोल सूत्र ” पुस्तक की समीक्षा —-डॉक्टर राहुल जैन (एम् डी. डी .एम् .न्यूरो मेडिसिन) एसोसिएट प्रोफेसर न्यूरोलॉजी ,प्यूपल मेडिकल कॉलेज एन्ड रिसर्च सेंटर भानपुर भोपाल

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पुस्तक के सम्बन्ध में मैं डॉक्टर अरविन्द जैन भोपाल द्वारा लिखी पुस्तक” स्वस्थ्य एवं सुखी जीवन के अनमोल सूत्र “ने चिकित्सा क्षेत्र में बहुत ही अनुकरणीय प्रयास किया हैं .जैसा की चिकित्सा क्षेत्र बहुत विशाल हैं और नित्य नए अनुसन्धान हो रहे हैं .पर डॉक्टर अरविन्द ने अथक परिश्रम कर चिकित्सा के बहु -आयामों में एक पुस्तक में समायोजन करने का कार्य किया हैं .मैं उनकी भूरी भूरी प्रशंसा करता हूँ .
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥
हे प्रभु संसार के सभी प्राणी सुखी रहें, सभी प्राणी रोग आदि कष्‍टों से मुक्‍त रहें, संसार के सभी प्राणियों का जीवन मंगलमय हो और संसार का कोई भी प्राणी दुखी ना रहें। प्रभु ऐसी मेरी आपसे प्रार्थना है।
“शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’
शरीर ही सारे कर्तव्यों को पूरा करने का एकमात्र साधन है। इसलिए शरीर को स्वस्थ रखना बेहद आवश्यक है, क्योंकि सारे कर्तव्य और कार्यों की सिद्धि इसी शरीर के माध्यम से ही होनी है। अतः इस अनमोल शरीर की रक्षा करना और उसे निरोगी रखना मनुष्य का सर्वप्रथम कर्तव्य है।
‘पहला सुख निरोगी काया’ यह स्वस्थ रहने का मूल-मंत्र है।
शरीर में ही रोगों का स्थान हैं .रोग के स्थान मन और शरीर हैं .यदि मन अस्वथ्य होता हैं तो उसका प्रभाव शरीर पर पड़ता हैं और शरीर रुग्ण हो तो उसका प्रभाव मन पर पड़ता हैं दोनों एक दूसरे के पूरक हैं .स्वस्थ्य शरीर से हम ,धर्म,अर्थ ,काम ,मोक्ष पुरुषार्थ प्राप्त कर सकते हैं .
चिकित्सा शास्त्र का सिद्धांत हैं स्वस्थ्य मनुष्य के स्वास्थ्य की रक्षा करना और जो रोगी /आतुर /बीमार हैं उसकी चिकित्सा करना .यहाँ बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह हैं कि दोषों की विषमता रोग हैं और सामान्य अवस्था में लाना चिकित्सा हैं .यह सिद्धांत मानव जीवन के उत्थान के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं .जब तक जीवन में समता भाव नहीं आएगा तब तक सुखानुभूति नहीं हो सकती .यह बात स्वास्थ्य के साथ अध्यात्म क्षेत्र पर भी लागू होता हैं .आज चारों ओर विषमताएं होने से व्यक्ति ,समाज ,देश और विश्व में अशांति हैं जिसका मूल कारण साम्यता भाव का न होना .
स्वस्थ्य व्यक्ति ही स्वस्थ्य समाज की नीव /रीढ़ हैं .व्यक्ति की सम्मुन्नति से परिवार ,समाज की उन्नति हैं ,स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का मुख्य कारण आप तन ,मन, धन से स्वस्थ्य रह सकेंगे .एक रुग्ण व्यक्ति स्वयं के साथ परिवार ,और देश के लिए भार स्वरूप हो जाता हैं .इससे राष्ट्र को भी व्यक्ति के रखरखाव में खर्च वहन करना पड़ता हैं .इस पुस्तक में यही प्रयास किया गया हैं की व्यक्तिगत रूप से स्वस्थ्य रहकर स्वयं ,परिवार ,समाज और राष्ट्र सम्मुन्नत बन सके .
प्रस्तुत पुस्तक में १२ अध्याय हैं जिनमे एकल द्रव्य ,व्याधियां ,मानसिक रोग ,स्त्री,पुरुष ,बाल रोग ,स्वस्थ्य जीवन जीने के सूत्र ,ऋतू चर्या ,दिन चर्या ,आयुर्वेद चिकित्सा ,त्रय स्तम्भ ,कोरोना से सम्बंधित जानकारी ,अहिंसा यह खंड इस पुस्तक का प्राण हैं .उपरोक्त आधार पर यह पुस्तक निःसंदेह बहुत अधिक जनोपयोगी और लाभप्रद होगी .
चिकित्सा शास्त्र अत्यंत प्रगतिशील और नित्य नए खोजों में संलंग रहता हैं ,इसको अद्यतन करना दुरूह कार्य हैं पर इस पुस्तक में लेखकों द्वारा जितना भी अधिकतम समायोजित करजानकारी देने का प्रयास किया गया हैं जो जनसामान्य के लिए लाभकारी होगी, यह प्रयास किया गया हैं .
पुस्तक के लेखक और संपादक क्रमशः डॉक्टर अरविन्द जैन एवं डॉक्टर शैलेष जैन को बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं. पुस्तक जानकारीयुक्त ,संग्रहणीय हैं ऐसी आशा करता हूँ .
डॉक्टर राहुल जैन (एम् डी ,डी .एम् .न्यूरो मेडिसिन) एसोसिएट – प्रोफेसर न्यूरोलॉजी ,प्यूपल मेडिकल कॉलेज एन्ड रिसर्च सेंटर ,भानपुर ,भोपाल मध्य प्रदेश

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