सुख सबके हिस्से, संघर्ष सिर्फ मेरे क्यों ? – अंशुल शास्त्री

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सुख सबके हिस्से, संघर्ष सिर्फ मेरे क्यों ? – अंशुल शास्त्री

मुरैना/सांगानेर (मनोज जैन नायक) ‎आज वर्तमान काल में मनुष्य की सबसे बड़ी जिज्ञासा यही बन चुकी है कि — हम धर्म भी करते हैं, पूजन भी करते हैं, दान भी करते हैं, किसी का अहित भी नहीं सोचते, फिर भी हमारे जीवन में दुख, बीमारी और अभाव क्यों हैं ? ‎यह प्रश्न लगभग प्रत्येक व्यक्ति के मन में कभी न कभी अवश्य उठता है।
‎मनुष्य सदैव दूसरों के सुख को देखकर अपने जीवन को दुखी मान बैठता है। उसे लगता है कि सामने वाले के पास अपार संपत्ति, बड़ा मकान, वाहन और सुविधाएँ हैं, जबकि उसके जीवन में संघर्ष ही संघर्ष हैं। परंतु वह यह नहीं देखता कि उसके पास भी बहुत कुछ ऐसा है, जो अनेक लोगों के पास नहीं है। उक्त उद्गार जैन विद्वत अंशुल जैन शास्त्री सांगानेर ने व्यक्त किए।
‎संतोष का भाव समाप्त होते ही दुख का जन्म हो जाता है।
‎इस संदर्भ में आचार्य विद्यासागर महाराज ने अत्यंत सुंदर बात कही थी कि — मनुष्य दुखी इसलिए है, क्योंकि वह अपने से आगे वालों को देखता है, अपने से पीछे वालों को नहीं।
‎यदि मनुष्य अपने जीवन में उपलब्ध सुखों और ईश्वर प्रदत्त अनमोल वस्तुओं का मूल्य समझने लगे, तो उसका जीवन स्वयं ही आनंदमय बनने लगे।
‎जैन दर्शन के अनुसार सुख और दुख का सबसे बड़ा कारण हमारे कर्म हैं। वर्तमान में जो भी परिस्थितियाँ हमें प्राप्त हो रही हैं, वे हमारे पूर्व जन्मों एवं पूर्वकाल में किए गए कर्मों का ही परिणाम हैं। कर्मों के फल को पूर्णतः बदला नहीं जा सकता, परंतु अपने परिणामों को अवश्य बदला जा सकता है।
‎यदि विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य धैर्य, सहनशीलता और समता का भाव रखे, तो वही दुख भविष्य के सुख का कारण बन जाता है।
‎जीवन का एक और महत्वपूर्ण सत्य यह भी है कि केवल यह सोचते रहने से कि भगवान मेरा भला कर देंगे , कुछ नहीं होता। जब तक मनुष्य स्वयं शुभ कर्म नहीं करेगा, तब तक केवल प्रार्थना से परिस्थितियाँ नहीं बदलेंगी। धर्म हमें कर्म करने की प्रेरणा देता है, भाग्य के भरोसे बैठने की नहीं।
‎इसलिए जब भी मन में यह विचार आए कि मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है ?‌ तब स्वयं को यह स्मरण कराना चाहिए कि यह समय भी स्थायी नहीं है। जैसे दुख आया है, वैसे ही एक दिन सुख भी अवश्य आएगा। समय परिवर्तनशील है, और अंधकार के बाद प्रकाश निश्चित है।
‎आवश्यकता केवल धैर्य, अच्छे परिणाम और सत्कर्म बनाए रखने की है।

भाव लेखक
अंशुल जैन शास्त्री

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