शिष्य का प्रथम गुण उसे श्रवण करने वाला होना चाहिए:वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ————-
अजीत कोठिया डडूका बांसवाड़ा राजस्थान की रिपोर्ट
वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने
भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि योग्य शिष्य मे क्या-क्या गुण होने चाहिए यह बताते हुए कहा कि जो सदासी गुरुकुल में रहता है गुरु आज्ञा को नित्य पालन करता है समता में रहता है, उपधान पूर्वक अर्थात नियम पूर्वक शास्त्र अध्ययन करता है। वह प्रिय भाषी होता है शिक्षा को श्रवण करके ग्रहण करता है। शिष्य का पहला गुण सुश्रुषा अर्थात श्रवण करने वाला होना चाहिए। परम उपलब्धि की भावना से शिष्यत्व ग्रहण करने वाला सर्वश्रेष्ठ है। श्रोता सुख का अभिलाषी होना चाहिए। क्योंकि जो सुख चाहेगा वही शास्त्र श्रवण करेगा। श्रोता 8 गुणो से युक्त होता है। सुव्यवस्थित ज्ञान होना चाहिए। अनेक भाषाओं के ज्ञान रखने वाले की स्मरण शक्ति अधिक होती है।
गुरुदेव जो बोलते हैं उसे भावना पूर्वक एकाग्रचित होकर सुनना चाहिए भगवान ने हमें पांच इंद्रियों दी हैं स्पर्शन,रसना, घ्राण, चक्षु, कर्ण इनमें कर्ण इंद्रिय सबसे श्रेष्ठ है। जो सुन नहीं पाते हैं वह बोल भी नहीं पाते हैं। प्राचीन काल में अनेक अंधे भी श्रेष्ठ कवि हुए हैं। जो अधिक सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता होता है।जो हितोपदेश नहीं सुनता है वह श्रेष्ठ वक्ता नहीं बन सकता।
योग्य शिष्य का दूसरा गुण प्रति प्रच्छना अर्थात पूछना जिज्ञासा करना परम तप है। तत्व जिज्ञासा करनी चाहिए परंतु तत्व जिज्ञासा करने में अहंकार बाधक होता है।
एकाग्रचित होकर सुनना यह श्रोता का तीसरा गुण है। आचार्य श्री हमेशा स्वाध्याय कराते हुए कहते हैं मुझे ही देखो मुझे ही सुनो मेरे सामने ही देखो। एकाग्रता बिना विषय को नहीं समझ सकते।
शिष्य का चौथा गुण ग्रहण करना है। एक कान से सुनना दूसरे कान से निकाल देना यह श्रेष्ठ श्रोता का लक्षण नहीं है। अयोग्य शिष्य कहता है मैं घर्म जानुगा पर धर्म नहीं करूंगा मैं अधर्म जानता हूं परंतु अधर्म नहीं छोडूंगा।
जो सुनता है वह आचरण में लाने वाला श्रेष्ठ श्रोता है। बुरा ना सोचना यह सबसे श्रेष्ठ है। गांधी जी के तीन बंदर बुरा ना देखो, बुरा ना सुनो, बुरा ना बोलो इतना ही पूर्ण नहीं है उसके साथ-साथ बुरा ना सोचो जोड़ना चाहिए यह श्रेष्ठ विचार है।
अच्छा भोजन करें परंतु पचे नहीं तो पाइजन बन जाता है। तत्व जिज्ञासु बने बिना सही विद्यार्थी नहीं बन सकते।
उपाहोऊ अर्थात सोचना चाहिए विज्ञान में परिकल्पना को अधिक महत्व दिया गया है परिकल्पना से बुद्धिमता अधिक बढ़ती है।
लोक में प्रचलित मान्यता को सही मानना रूढ़िवादिता है अंधविश्वास है।
धारण करना स्मरण ज्ञान बिना जोड़ रूप ज्ञान नहीं होगा। शब्द ज्ञान बिना भाषा ज्ञान नहीं होगा। गुरु से प्राप्त ज्ञान को जीवन में उतारना चाहिए प्रयोग में लाना चाहिए।
सुख सुविधाओं से विद्यार्थी अधिक निकम्मे बन जाते हैं।
जो स्वर्ग मोक्ष ले जाए वह मोक्ष विनय है। विनय मोक्ष का द्वार है।
विनय से ही अनुशासन होता है विनय ही अनुशासन है अतः शिष्य को विनय से युक्त होना चाहिए। शिक्षा का फल विनय है। विनय का फल सर्व जीवो का कल्याण है। विनयवंत को ही गुरु अनुशासित करते हैं। स्वयं अनुशासित रहने वाला ही अपने शिष्यों को भक्तों को अनुशासित कर सकता है। विनय से संयम,विनय से तप, विनय से दान आदि होता है। विनयवंत पर ही अनुग्रह किया जाता है। विनयवान शिष्य पर ही गुरु अनुग्रह निग्रह करते हैं सभी पर नहीं। साधु पत्नी के पति नहीं त्रिलोक्य पति होते हैं। अविनीत शिष्य बनना संभव नहीं है,, जिसको अनुशासित करके पढा करके आगे बढ़ाया जा सके वह शिष्य है जो विनयवंत है वही शिष्य हैं।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी गुरुदेव ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता
छोटी तुच्छ घास हूं सबसे मैं नीचे हूं पैर के नीचे सबसे तुच्छ हु। सर्दी गर्मी वर्षा सब सहन करु हु।
द्वारा मंगलाचरण किया। इस अवसर पर मुनि श्री अध्यात्मनंदी सौम्यनदी, सुवत्सलमति माताजी, क्षु भक्ति श्री ब्रह्मचारी वर्ण भैया, शैलेंद्र जी भट्ट सारिका जी भट्ट विदुषी उर्वशी प्रतिभा प्रेमलता,ममता, राजकुमारी, चंद्रलेखा, चंद्रकांत जी, श्रीपाल जी धनपाल जी आदि भीलुड़ा कोटा पुनर्वास कॉलोनी, खोड्न आदि से अनेक श्रावक उपस्थित थे। ये जानकारी
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।
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