शान्ति वही दे सकता है, जो स्वयं शान्त हो

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संगति का जीवन में विशिष्ट महत्व हुआ करता है। संगति का असर मनुष्यों पर ही होता हो, यह जरूरी नहीं है। संगति के प्रभाव से अचेतन पदार्थ भी प्रभावित होते हुए दिखाई देते हैं। चलते-चलते आप किसी पानी के झरने के समीप पहुँच जाते हैं तो सहज ही शीतलता का अनुभव होने लगता है, ऐसे ही परम शान्ति का सर्वोत्कृष्ट स्थान ऐसे जिनालय में आने पर भव्यान्मा धर्मात्मा पुरुषों को सहज ही शान्ति का अनुभव होने लगता है। जिनेन्द्र भगवान व जिनालयों की ऐसी ही महिमा होती हैं कि हमारे द्वारा पूर्वभवों में बाँधे हुए वज्रकर्म भी छार- छार हो जाते हैं, दूर हो जाते हैं !
इस धरा पर सर्वोत्कृष्ट पुण्यधारी यदि कोई हैं तो वे एकमात्र तीर्थकर देव ही हुआ करते हैं। भगवान की अद्‌भुत समवशरण सभा में स्वर्ग के देवों द्वारा साढ़े बारह करोड़ वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं जिनकी मधुर और उच्च स्वर ध्वनि को सुनकर भव्य- श्रद्धालु दौड़े-दौड़े भगवान के समवशरण में आते हैं वहाँ साक्षात् तीर्थकर भगवान के दर्शन पाकर कर्म पर्वतों को चूर-चूर कर डालते हैं और सातिशय पुण्य का उपार्जन किया करते हैं। वर्तमान में भगवान के जिनालय ही समवशरण के प्रतीक हुआ करते हैं। भव्य जीव समवशरण में पहुंचकर जिस पुण्य का उपार्जन करते थे, यदि आज हम भी श्रेष्ठ भावनाओं के साथ जिनालय में प्रवेश करते हैं तो हमें आज भी साक्षात् समवशरण में जाने का पुण्य प्राप्त हो सकता है। जिनमंदिर में भगवान की वीतरागी सहज-शान्त छवि को निहारते हुए हमें यह भावना करना चाहिए, कि हे भगवन्! मैं भी कब आपके समान गुण- वैभव को प्राप्तकर आत्मा के सहज सुख गुण का अनुभव करूँगा ,,भगवान की प्रतिमा हमें मौन उपदेश प्रदान करती है “बेटा, जो गुण-वैभव मैंने प्रगट कर लिया है वहीं, वैसा ही गुण- वैभव तेरे अन्दर भी विद्यमान है, अब तू मी बाह्य पदार्थों से दृष्टि हटाकर अपने अन्दर छुपे हुए गुण- वैभव को निहार, उन गुणों को स्वयं अनुभव कर, तो तू भी मेरी तरह पूर्णता को प्राप्त हो जाएगा । तू भी भगवान बन जाएगा !
धर्म सभा में महेंद्र जैन, अशोक जैन , पवन मोदी, उदय चंद  ब्या, अशोक माते, मुकेश जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे ।

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