संत जोड़ने का कार्य करते हैं : उपाध्याय श्री विशेषसागर जी महाराज

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संत जोड़ने का कार्य करते हैं : उपाध्याय श्री विशेषसागर जी महाराज

✍️ विनोद रोकडे जैन

हरदा | धर्म प्रभावना एवं संत समागम के पावन अवसर पर श्री 1008 शांतिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, हरदा में आयोजित धर्मसभा में प. पू. उपाध्याय श्री 108 विशेषसागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने अपनी दिव्य देशना में स्पष्ट कहा है कि “व्यक्ति जन्म से नहीं, बल्कि अपने कर्मों से महान बनता है।”

उपाध्याय श्री ने कहा कि जो व्यक्ति नित्य देव दर्शन करता है, पानी छानकर पीता है, रात्रि भोजन का त्याग करता है तथा अष्ट मूलगुणों का पालन करता है, वही वास्तविक अर्थों में जैन कहलाने का अधिकारी है।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य उपाध्याय श्री ने कहा कि हरदा के श्रद्धालु अत्यंत सौभाग्यशाली हैं, जिन्हें समय-समय पर संतों का सान्निध्य, सेवा एवं चातुर्मास कराने का अवसर प्राप्त होता है। आज भी अनेक गांव एवं नगर ऐसे हैं, जहाँ साधु-संतों का आगमन तक नहीं हो पाया है।

उन्होंने कहा कि संत समाज और विश्व की अमूल्य धरोहर होते हैं। उनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र, धर्म, समाज एवं मानवता के कल्याण के लिए समर्पित रहता है। संत समाज और व्यक्तियों को जोड़ने का कार्य करते हैं तथा सदैव सद्भाव, संयम और संस्कारों की प्रेरणा देते हैं।

इस अवसर पर जानकारी दी गई कि प. पू. उपाध्याय श्री 108 विशेषसागर जी महाराज (ससंघ) का मंगल विहार सर्वज्ञ तीर्थ पुसेगांव (महाराष्ट्र) से प. पू. गणाचार्य श्री 108 विरागसागर जी गुरुदेव की जन्मभूमि एवं पावन विरागोदय तीर्थ, पथरिया जिला दमोह की ओर प्रारंभ हुआ है।

उल्लेखनीय है कि पूज्य उपाध्याय श्री ने महाराष्ट्र प्रांत में अब तक 11 चातुर्मास संपन्न कराए हैं। उनके मार्गदर्शन एवं प्रेरणा से महाराष्ट्र में लगभग 20 से 22 मंदिरों का जीर्णोद्धार एवं प्रतिष्ठा कार्य सम्पन्न हुआ है। वर्तमान में गांधीग्राम में नए मंदिर का निर्माण कार्य तथा शाहपुर एवं मोताला में प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार का कार्य प्रगति पर है।

उपाध्याय श्री ने कहा कि नए मंदिरों के निर्माण से अधिक श्रेष्ठ कार्य प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार एवं संरक्षण करना है, क्योंकि इससे धर्म की प्राचीन विरासत सुरक्षित रहती है।

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