सम्यक दृष्टि बनने के बाद जीव विकास प्रारंभ करता है:सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव————

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सम्यक दृष्टि बनने के बाद जीव विकास प्रारंभ करता है:सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव————
अजीत कोठिया डडूका बांसवाड़ा राजस्थान की रिपोर्ट
वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि आत्मा को पावन करें वह पुण्य तथा जो आत्मा का पतन करें वह पाप है। अशुभ को छोड़कर शुभ भाव से शुद्ध भाव करने पर जीव मोक्ष प्राप्त करता है। सम्यक दृष्टि बनने के बाद जीव विकास प्रारंभ करता है। पापानुबंधी पुण्य से रावण की तरह बन जाते हैं। पहले के पुण्य से रावण के पास सब कुछ था परंतु इस भव में पापात्मक कार्य करने से पाप बंध ही हुआ जिससे नरक जाना पड़ा। पुण्यानुबंधीपुण्य उससे राम की तरह जीव स्वयं पर विजय प्राप्त करता है। पूर्व पुण्य से राम ने जो प्राप्त किया था उससे पुण्य कार्य ही किया। शुभ भाव से ही शुद्ध बुद्ध आनंद बन जाते हैं।
शुभ अशुभ, शुद्ध का वर्णन करते हुए आचार्य श्री बताते हैं। गृहस्थ के संपूर्ण पाप कार्यों को परिग्रह को, अशुभ भावों को साधु छोड़ देते हैं श्रावक योग्य दान तथा पूजा भी नहीं करते हैं। गृहस्थ संबंधी मरण पर्यंत जो पाप किया जाता है वह साधु बनते ही एक रात्रि में ही नष्ट हो जाते हैं। चक्रवर्ती किमिच्छिक दान 12 वर्ष तक करते हैं फिर भी साधु जितना पुण्य नहीं कर सकते। भरत चक्रवर्ती ने कैलाश पर्वत पर सोने के 72 जिनालय बनवाये फिर भी उन्हें साधु बनने जितना पुण्य नहीं मिला। गृहस्थ जिन पापों को अनादि काल से कर रहा है उसे दान देकर नष्ट नहीं कर सकते हैं वह पाप एक रात्रि का दीक्षित साधु अंतर मुहूर्त में नष्ट कर देता है। चक्रवर्ती भी साधु के बराबर पुण्य नहीं कर सकता। जन्म से मरण पर्यंत जो पाप कर्मों को संचित करता है वह लाखों वर्षों में भी नष्ट नहीं कर सकता परंतु साधु बनते ही एक रात्रि में नष्ट कर देता है।
श्रेष्ठ साधु अंतिम समय में आहार औषधि तथा जो साधु के व्रत लिए थे उनका भी त्याग कर देता है। आत्मा के विकास को केंद्र करके ही साधु समस्त धर्म करते हैं।
साधू सिंह की तरह परम पद का अन्वेषण करते हैं। साधु निर्भीक स्वाभिमानी निशंक मेरू के समान अचल समुद्र के समान गंभीर वीर, धीर, क्षमावंत, आकाश के समान व्यापक होते हैं।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता
चल एकला चल एकला चल एकला, राही चल एकला।
छोड़ो दुनिया का मेला,राह में राही चल एकला।
अध्यात्म में एकत्व भावना का वर्णन है। जीव संसार में एकला आता है तथा एकला ही जाता है।
गुरुदेव कहते हैं संसार एक मोह माया का मेला है जब तक अपेक्षा व स्वार्थ पूरा हो तब तक ही सब साथ रहते हैं। वास्तव में जीव एकला ही रहता है पूरे परिवार के लिए पाप करता है परंतु उसका परिणाम वह स्वयं अकेला ही भोक्ता है। भीड़ में रहकर भी आंतरिक एकत्व को नहीं भूलना चाहिए। स्वयं की आत्मा को छोड़कर इस संसार में जीव का कोई शरण नहीं है. अकेला चलने से भटकाव से मुक्ति मिलती है.। अकेला चलने वाला कभी अपना रास्ता नहीं भुलता। स्वयं का ज्ञानानंद रूपी सखा भव भावांतर में आत्मा का साथ देता है। जब तक जीव एकला रहना नहीं सीखेगा तब तक ज्ञानानंद आत्मा से उसका मिलन नहीं होगा।
ए आई ने आचार्य श्री की अंहकार शून्यता की पराकाष्ठा का वर्णन करते हुए बताया कि ज्ञान की सर्वोच्च शिखर पर बैठकर भी आचार्य श्री स्वयं को छोटा भोला छात्र ज्ञान साधन पात्र मानते हैं. स्वयं को सिंधु में बिंदु जितना मानते हैं परंतु सिंधु से स्वयं को अलग नहीं मानते। स्वयं केवल ज्ञान अनंत ज्ञान प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्पित है. ख्याति पूजा लाभ से दूर रहकर ज्ञान की सतत साधना करते हैं। आचार्य श्री संपूर्ण संसार को जगाते हैं कहते हैं समुद्र मंथन की तरह ज्ञान का मंथन करते रहो तभी आत्मा का कल्याण संभव है।
इस अवसर पर मुनिश्री अध्यात्मनंदी, सौम्यनदी, सुवत्सलमति माताजी, क्षु सुविक्षमति, भक्ति श्री बाल ब्रह्मचारी वर्ण भैया, समाज के अध्यक्ष नरेंद्र जी मुनि सेवा संघ समिति के अध्यक्ष दिनेश जी, पंडित धनपाल जी नगिन जी राजेंद्र जी गोवाडिया, राजू भाई मनीष पंचोली मनीष, मनोज गला लिया मनोज पंचोरी, राजेंद्र जी अमित जी, राजेशजी,गजेन्द्रजी,शांतिलाल जी विमल जी अजीत जी सुरेंद्र जी नरेंद्र जी शैलेंद्र जी शैलेषजी ब्रह्मचारी आशा देवी गुणमाला देवी मनीषा, रागीनी,निलम, संगीता,अंजना सविता शिल्पा रेखा रूषमा दीपिका मीना आदि अनेक लोग उपस्थित थे..। ये जानकारी विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।

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