सामायिक का महत्‍व,लाभ एवं विधि — विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन भोपाल

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हर जीव हर क्षण किसी से राग करते हैं और किसी से द्वेष करता हैं .जिस प्रकार तुला के दो पलड़े होते हैं जो पलड़ा भारी होता हैं वह नीचे की ओर झुकता हैं और जो हल्का होता वह ऊपर जाता हैं . समतुला में हम वस्तु ग्रहण करते हैं इसी प्रकार हमें भी समत्व भाव में रहना चाहिए तभी हम शांति पा सकते हैं इसी के लिए सामायिक अमोघ यंत्र का कार्य करता हैं .
सामायिक का अर्थ है समता की साधना, इस क्रिया में जैन श्रावक-श्राविका एकांत भाव में रहकर तीर्थंकरों व धर्म का चिंतन करते हैं।
एक आत्‍मा प्रतिदिन लाख मुद्राओं का दान करती है और दूसरी मात्र दो घड़ी की शुद्ध सामायिक करती है, तो वह स्‍वर्ण मुद्राओं का दान करने वाली आत्‍मा, सामायिक करने वाले की समानता प्राप्‍त नहीं कर सकती। आर्त और रौद्र ध्‍यान को त्‍याग कर संपूर्ण सावद्य (पापमय) क्रियाओं से निवृत्त होना और एक मुहूर्त पर्यन्‍त मनोवृत्ति को समभाव में रखना- इसका नाम ‘सामायिक व्रत’ है।
सामायिक मन को स्‍थिर रखने की अपूर्व क्रिया है, आत्‍मिक अपूर्व शांति प्राप्‍त करने का संकल्‍प है, परम पद पाने का सरल और सुखद मार्ग है। अखंडानंद प्राप्‍त करने का गुप्‍त मंत्र है, दु:ख समुद्र को तिरने का श्रेष्‍ठ जहाज है।अनेक कर्मों से मलीन हुई आत्‍मा को परमात्‍मा बनाने का सामर्थ्‍य सामायिक क्रिया में ही है। यह क्रिया करने से आत्‍मा में रहे दुर्गुण नष्ट होकर, सद्गुण प्राप्‍त होते हैं और परम शांति का अनुभव होता है।
सामायिक पाठ
प्रेम भाव हो सब जीवों से, गुणीजनों में हर्ष प्रभो।
करुणा स्रोत बहे दुखियों पर,दुर्जन में मध्यस्थ विभो॥ १॥
यह अनन्त बल शील आत्मा, हो शरीर से भिन्न प्रभो।
ज्यों होती तलवार म्यान से, वह अनन्त बल दो मुझको॥ २॥
सुख दुख बैरी बन्धु वर्ग में, काँच कनक में समता हो।
वन उपवन प्रासाद कुटी में नहीं खेद, नहिं ममता हो॥ ३॥
जिस सुन्दर तम पथ पर चलकर, जीते मोह मान मन्मथ।
वह सुन्दर पथ ही प्रभु मेरा, बना रहे अनुशीलन पथ॥ ४॥
एकेन्द्रिय आदिक जीवों की यदि मैंने हिंसा की हो।
शुद्ध हृदय से कहता हूँ वह,निष्फल हो दुष्कृत्य विभो॥ ५॥
मोक्षमार्ग प्रतिकूल प्रवर्तन जो कुछ किया कषायों से।
विपथ गमन सब कालुष मेरे, मिट जावें सद्भावों से॥ ६॥
चतुर वैद्य विष विक्षत करता, त्यों प्रभु मैं भी आदि उपान्त।
अपनी निन्दा आलोचन से करता हूँ पापों को शान्त॥ ७॥
सत्य अहिंसादिक व्रत में भी मैंने हृदय मलीन किया।
व्रत विपरीत प्रवर्तन करके शीलाचरण विलीन किया॥ ८॥
कभी वासना की सरिता का, गहन सलिल मुझ पर छाया।
पी पीकर विषयों की मदिरा मुझ में पागलपन आया॥ ९॥
मैंने छली और मायावी, हो असत्य आचरण किया।
परनिन्दा गाली चुगली जो मुँह पर आया वमन किया॥ १०॥
निरभिमान उज्ज्वल मानस हो, सदा सत्य का ध्यान रहे।
निर्मल जल की सरिता सदृश, हिय में निर्मल ज्ञान बहे॥ ११॥
मुनि चक्री शक्री के हिय में, जिस अनन्त का ध्यान रहे।
गाते वेद पुराण जिसे वह, परम देव मम हृदय रहे॥१२॥
दर्शन ज्ञान स्वभावी जिसने, सब विकार हों वमन किये।
परम ध्यान गोचर परमातम, परम देव मम हृदय रहे॥१३॥
जो भव दुख का विध्वंसक है, विश्व विलोकी जिसका ज्ञान।
योगी जन के ध्यान गम्य वह, बसे हृदय में देव महान्॥ १४॥
मुक्ति मार्ग का दिग्दर्शक है, जनम मरण से परम अतीत।
निष्कलंक त्रैलोक्य दर्शी वह देव रहे मम हृदय समीप॥ १५॥
निखिल विश्व के वशीकरण वे, राग रहे न द्वेष रहे।
शुद्ध अतीन्द्रिय ज्ञान स्वभावी, परम देव मम हृदय रहे॥ १६॥
देख रहा जो निखिल विश्व को कर्म कलंक विहीन विचित्र।
स्वच्छ विनिर्मल निर्विकार वह देव करें मम हृदय पवित्र॥ १७॥
कर्म कलंक अछूत न जिसको कभी छू सके दिव्य प्रकाश।
मोह तिमिर को भेद चला जो परम शरण मुझको वह आप्त॥ १८॥
जिसकी दिव्य ज्योति के आगे, फीका पड़ता सूर्य प्रकाश।
स्वयं ज्ञानमय स्व पर प्रकाशी, परम शरण मुझको वह आप्त॥ १९॥
जिसके ज्ञान रूप दर्पण में, स्पष्ट झलकते सभी पदार्थ।
आदि अन्तसे रहित शान्तशिव, परम शरण मुझको वह आप्त॥
जैसे अग्नि जलाती तरु को, तैसे नष्ट हुए स्वयमेव।
भय विषाद चिन्ता नहीं जिनको, परम शरण मुझको वह देव॥
तृण, चौकी, शिल, शैलशिखर नहीं, आत्म समाधि के आसन।
संस्तर, पूजा, संघ-सम्मिलन, नहीं समाधि के साधन॥ २२॥
इष्ट वियोग अनिष्ट योग में, विश्व मनाता है मातम।
हेय सभी हैं विषय वासना, उपादेय निर्मल आतम॥ २३॥
बाह्य जगत कुछ भी नहीं मेरा, और न बाह्य जगत का मैं।
यह निश्चय कर छोड़ बाह्य को, मुक्ति हेतु नित स्वस्थ रमें॥
अपनी निधि तो अपने में है, बाह्य वस्तु में व्यर्थ प्रयास।
जग का सुख तो मृग तृष्णा है, झूठे हैं उसके पुरुषार्थ॥ २५॥
अक्षय है शाश्वत है आत्मा, निर्मल ज्ञान स्वभावी है।
जो कुछ बाहर है, सब पर है, कर्माधीन विनाशी है॥ २६॥
तन से जिसका ऐक्य नहीं हो, सुत, तिय, मित्रों से कैसे।
चर्म दूर होने पर तन से, रोम समूह रहे कैसे॥ २७॥
महा कष्ट पाता जो करता, पर पदार्थ, जड़-देह संयोग।
मोक्षमहल का पथ है सीधा, जड़-चेतन का पूर्ण वियोग॥ २८॥
जो संसार पतन के कारण, उन विकल्प जालों को छोड़।
निर्विकल्प निद्र्वन्द्व आत्मा, फिर-फिर लीन उसी में हो॥ २९॥
स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ, फल निश्चय ही वे देते।
करे आप, फल देय अन्य तो स्वयं किये निष्फल होते॥ ३०॥
अपने कर्म सिवाय जीव को, कोई न फल देता कुछ भी।
पर देता है यह विचार तज स्थिर हो, छोड़ प्रमादी बुद्धि॥ ३१॥
निर्मल, सत्य, शिवं सुन्दर है, अमितगति वह देव महान।
शाश्वत निज में अनुभव करते, पाते निर्मल पद निर्वाण॥ ३२॥
दोहा
इन बत्तीस पदों से जो कोई, परमातम को ध्याते हैं।
साँची सामायिक को पाकर, भवोदधि तर जाते हैं॥
सामायिक के लाभ
1-सामायिक करने वाला, दो घड़ी के लिए समस्‍त पाप क्रियाओं का परित्‍याग कर देता है, जिससे उसके नए अशुभ कर्मों का बंधन बहुत रुक जाता है। उपरांत पुरानों की निर्जरा होती है तथा उत्तम पुण्‍यों का संचय होता है।
2-सामायिक से धार्मिक आत्‍म-गुणों का विकास होता है, क्‍योंकि उसमें अशुभ तथा अशुद्ध क्रियाओं के वर्जन और शुभ शुद्ध क्रियाओं के सेवन का शिक्षण = अभ्‍यास किया जाता है।
3-जैसे- जहाँ रानी मधुमक्‍खी बैठती है, वहाँ दूसरी मधुमक्‍खियाँ छत्ते को बाँधकर, मधु का संचय करती हैं। वैसे ही, सामायिक भी रानी मधुमक्‍खी के समान है। सामायिक की साधना प्रारंभ करने पर उसमें स्‍वाध्‍याय, जप, ध्यान, भावना आदि साधना के कई अंग गतिशील होते हैं और फिर उसमें भावरूप मधु का संचय होता है।
4-सामायिक धार्मिक-आध्‍यात्‍मिक व्‍यायामशाला के समान है, जिसमें आत्‍मा भाव-व्‍यायाम करके, अपने सद्गुणों को पुष्‍ट करता है।
5-सामायिक वस्‍तुत: ‘साधुत्‍व का पूर्व अभ्‍यास’ है। आत्‍मा को परमात्‍म-स्‍वरूप में रूपांतरण की प्रक्रिया ‘साधुत्‍व’ है। अत: यह बात सहज में ही सिद्ध हो जाती है कि सामायिक का सच्‍चा आराधक साधु-स्‍वरूप तथा परमात्‍मा-स्‍वरूप पाने के उपाय का सेवन कर रहा है।
6-एक भाई, व्‍याख्‍यान के बाद वक्‍तव्‍य में बोले – ‘मैं स्‍थानक में आया, सामायिक वाले भाई से टकरा गया’ तो क्रोध का प्रसाद पाया और सिनेमा हॉल में गया, वहाँ एक भाई से टकरा गया तो समता के बोल पाए।’ वस्‍तुत: यह चित्रण नहीं है। यह तो सामायिक वालों का उपहास है। कदाचित ऐसा सही हो भी, तो स्‍थानक और सिनेमा के प्रसंग विरले होंगे। परंतु हमें तो उस भाई के कथन से यह शिक्षा ही ग्रहण करना है कि हमारी सामायिक अधिक से अधिक निर्मल हो, वह उसका प्रभाव पूरे जीवन में व्‍याप्‍त हो जाए और जीवन समभाव से भावित बन जाए।
7-बूँद-बूँद से घड़ा भरने के समान एक सामायिक प्रतिदिन करने वालों की एक महीने में, एक अहोरात्रि और बारह महीने में बारह अहोरात्रि (दिन-रात) धर्म ध्यान में व्‍यतीत होती है। ऐसे 30 वर्ष में 360 दिन-रात आराधनामय हो जाते हैं।
8-एक सामायिक का फल- बानवे करोड़ उनसाठ लाख, पच्‍चीस हजार, नौ सौ पच्‍चीस पल्‍योपम से अधिक नारकी का आयुष्‍य क्षयकर देवता का अधिक शुभ आयुष्‍य उपार्जन होता है।
9- ‘एक शुद्ध सामायिक की दलाली सात स्‍वर्ण मेरु से बढ़कर है।’
एक सामायिक का मूल्‍य-
राजा श्रेणिक ने, भगवान महावीर से एक सामायिक का मूल्‍य पूछा, तो भगवान ने उत्तर दिया- ‘हे राजन् ! तुम्‍हारे पास जो चाँदी, सोना व जवाहर राशि हैं, उनकी थैलियों को ढेर यदि सूर्य और चाँद को छू जाएँ, फिर भी एक सामायिक का मूल्‍य तो क्‍या, उसकी दलाली भी पर्याप्‍त नहीं होगी।’
सामायिक की विधि-
1 (अ)- लेने की विधि-
१ सामायिक के योग्‍य वेश = वस्‍त्रों को धारण करना
2) बैठने की भूमि का पूँजनी से प्रमार्जन करना
3)आसन को अच्‍छी तरह देखकर बिछाना
4) मुखवस्‍त्रिका का प्रतिलेखन करके डोर से मुख बाँधना (आगे की विधि खड़े रहकर या पल्‍यंकासन-पलांठी से बैठकर करना)
(ब)- आगे के पाठों को क्रमानुसार बोलने की विधि-
1)नमोक्‍कार मंत्र
2)गुरुवंदना के पाठ से 3 बार वंदना
3)सम्‍यकत्व सूत्र
4)इरियावहिय सूत्र
5) कायोत्‍सर्ग प्रतिज्ञा (तस्‍स उत्तरी) सूत्र- (‘ताव कायं ठाणेणं’ तकि पाठ बोलने के बाद कायोत्‍सर्ग में बिलकुल मौन रूप से) दो लोगस्‍स तथा नमोक्कार मंत्र का ध्‍यान करना। फिर कायोत्‍सर्ग खोलकर, नमोक्‍कार मंत्र का ध्‍यान करना
6)कायोत्‍सर्ग-दोष-विशुद्धि का पाठ
लाख खंडी सोनातणी, लाख वर्ष दे दान।
सामायिक तुल्‍य नहीं, कहा ग्रन्‍थ दरम्‍यान ।1।
दिवसे-दिवसे लक्‍खं, देई सुवण्‍णस्‍स खंडियं एगो।
एगो पुण समाइयं, करइ, न पहुप्‍पए तस्‍स।2।
सामायिक का लाभ
1. समता पूर्वक करने से 92 करोड़ 59लाख 24हजार 925पल्योपम(अर्थात् असंख्य वर्ष) जितना देव आयुष्य का बंधन होता है।
2. 20 मन की एक खंड़ी होती है-ऐसी लाख लाख सोने की खंडी एक लाख वर्ष तक प्रतिदिन कोई दान दे और दूसरा कोई एक सामायिक करें तो वह दान देने का पुण्य सामायिक के बराबर नहीं आ सकता।
3. नरक गति के बंध को तोडने की ताकत सामायिक में है ।
4. सामायिक करने से चार प्रकार के धर्म का पालन होता है।
1. दान धर्मः- चौदह राजलोक के 6 कायिकजीवों को अभयदान मिलता है।
2.शील धर्मः- सामायिक में शीलव्रत का पालन होता है। बालको से बालिका या स्त्री का एवं बालिकाओं से
बालकों या पुरुष का स्पर्श नही किया जा सकता ।
3.तप धर्मः- सामायिक में चारों प्रकार के आहार का त्याग होने के कारण तप धर्म तथा काय क्लेश रुपी तप होता है।
4.भाव धर्मः- सामायिक की क्रिया भावपूर्वक करनी होती है। इस प्रकार चारों धर्मो की आराधना हो जाती है।
5. श्राद्ध विधि प्रकरण ग्रंथ में लिखा हुआ है कि घर के बजाय उपाश्रय में सामायिक करने सेएक आयंबिल तप का लाभ प्राप्त होता है।
6. जो जीव मोक्ष में गए है, जाते है तथा जाएंगे, यह सब सामायिक का प्रभाव है।
सामायिक लेने की विधि
सामायिक ग्रहण करने के 9 सूत्र होते हैं, प्रत्येक सूत्रों को बोलकर सामायिक ग्रहण की जाती है, उसके पश्चात 48 मिनट तक मन वचन, और काया से 32 दोषो को टाला जाता है। जिसमें 10 मन के, 10 वचन के, और 12 काय के दोष माने जाते हैं।
जिस व्यक्ति ने सामायिक प्रतिमा ली है उसे सुबह 6 बजे, दोपहर 12 बजे और शाम 6 बजे 48 से 96 मिनट तक सामायिक करनी होती है यदि आपने सामायिक प्रतिमा नहीं ली है तो आप इसे कम समय के लिए भी कर सकते हैं। यहां तक ​​कि द्वितीय प्रतिमा धारी के पास भी सामायिक शिक्षा व्रत है, वह भी इसे 48 मिनट से कम समय तक कर सकता है।
सामायिक के दौरान हम न केवल सभी सांसारिक मामलों को त्याग देते हैं, बल्कि राग-द्वेष से भी दूर रहते हैं। यह गतिविधि हमें अपने जुनून और इच्छाओं को शुद्ध करने में मदद करती है । सामायिक करने के लिए हम सादे, सफेद कपड़े पहनते हैं और एक शांत स्थान पर रहते हैं।
मन को चंचल करना, वचन को अशुभ या चंचल करना, काय को अस्थिर रखना, सामायिक में अनादर करना, प्रमाद से पाठ को भूल जाना ये पांच अतिचार सामायिक व्रत के हैं। इनको छोड़ने से आत्मतत्त्व का ज्ञान होता है
सामायिक जैन धर्म में उपासना का एक तरीका है । दो घड़ी अर्थात 48 मिनट तक समतापूर्वक शांत होकर किया जाने वाला धर्म-ध्यान ही सामायिक है।जैन आगमो में ऐसा वर्णन है कि चाहे गृहस्थ हो या साधु सामायिक सभी के लिए अनिवार्य है। अपने जीवनकाल में से प्रत्येक दिन केवल दो घड़ी का धर्म ध्यान करना ही सामायिक कहलाता है। सामायिक का अर्थ है आत्मा में रमण करना। समता पूर्वक पाप का त्याग करना ही सामायिक है।
सामायिक लेने की विधि
सामायिक लेने से पहले अरिहंत भगवान श्री सीं मधर स्वामी को प्रणाम करते हैं । उसके पश्चात अपने गुरुदेव की आज्ञा लेकर करेमी भंते का पाठ पढ़ा जाता है। सामायिक ग्रहण करने के 9 सूत्र होते हैं, प्रत्येक सूत्रों को बोलकर सामायिक ग्रहण की जाती है, उसके पश्चात 48 मिनट तक मन वचन, और काया से 32 दोषो को टाला जाता है। जिसमें 10 मन के, 10 वचन के, और 12 काय के दोष माने जाते हैं।
लाख खंडी सोनातणी, लाख वर्ष दे दान।
सामायिक तुल्‍य नहीं, कहा ग्रन्‍थ दरम्‍यान ।1।
दिवसे-दिवसे लक्‍खं, देई सुवण्‍णस्‍स खंडियं एगो।
एगो पुण समाइयं, करइ, न पहुप्‍पए तस्‍स।2।
अक्षय है शाश्वत है आत्मा, निर्मल ज्ञान स्वभावी है।
जो कुछ बाहर है, सब पर है, कर्माधीन विनाशी है
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन ,संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104 पेसिफिक ब्लू, नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड ,भोपाल 462026 मोबाइल 09425006753

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