साधु में ही नव देवता समाहित हैं:सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव….. अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट

0
25

साधु में ही नव देवता समाहित हैं:सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव…..
अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट
वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने शिवगौरी सेवाश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि पूजा आराधना विनय का छोटा रूप है। साधु में ही नव देवता समाहित है। लाघव का अर्थ हल्कापन। जब लघुता आती है तो मस्तिष्क के अनेक न्यूरोन सक्रिय हो जाते हैं। विनय के अंतर्गत भक्ति है विनय का बहुत छोटा भाग भक्ति है।
जिनकल्पी साधु 6 महीने के उपवास करके जंगल में रहते हैं वह भगवान के दर्शन अभिषेक आदि नहीं देखते हैं उनके लिए दर्शन अभिषेक आवश्यक नहीं है। बाहुबली भगवान दीक्षा लेकर 12:महीने के ध्यान मैं बैठते हैं वह कहां दर्शन अभिषेक देखते हैं।
गुरु के प्रति भक्ति होने से गुरु सेवा भी होती है। धर्म करते हुए सुख शांति नहीं मिल रही है तो वह धर्म ही नहीं है। मार्दव, लाघव, आल्हाद यह गुण विनय करने वाले में प्रगट होते हैं।
भगवती आराधना ग्रंथ से आचार्य ऋषि ने बताया कि विनय से किर्ती होती है। सभी के साथ मित्रता होती है। विनय से गर्व का मर्दन होता है। गुरुजनो से बहुमान, आदर प्राप्त होता है तीर्थंकर की आज्ञा का पालन होता है।
साधु को भगवान का अभिषेक दर्शन करना आवश्यक नहीं है। सज्जन व्यक्तियों के सुसंगठित समूह को समाज कहते हैं। धर्म आत्मा का स्वभाव है। वर्तमान में लोग नैतिक भी नहीं सामाजिक भी नहीं। हर धर्म का पहला नियम नैतिकता है। जो हमारे लिए अच्छा नहीं है वह अन्य के लिए कैसे अच्छा हो सकता है।
दूसरों के दोषो को ढककर गुणो को बढ़ाना चाहिए। आरंभ परिग्रह करने वाले ख्याति पूजा लाभ चाहने वाले पंच परमेष्ठी में नहीं आते।
श्रावक धर्म को छोड़कर साधु धर्म पालन के लिए साधु बनते हैं। आठवीं प्रतिमा आरंभत्याग वाला भी आरंभ के कार्य नहीं कर सकता है नवमी प्रतिमा परिग्रहत्याग वाला परिग्रह नहीं रख सकता तो मंदिर मूर्ति निर्माण कैसे करेगा दसवीं अनुमति त्याग प्रतिमा वाला किसी भी कार्य की अनुमति नहीं दे सकता है 11वीं प्रतिमा उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा है।
मुनि की तीर्थ है। नव देवता में केवल मूर्ति का ही अभिषेक होता है। स्वर्ग के देव जन्म के अंतर मुहूर्त में ही सतत पूजा करते रहते हैं। लोकातिंक देव तप कल्याणक में ही आते हैं। अन्य कल्याणक में नहीं। सर्वार्थ सिद्धि के देव तो किसी भी कल्याण में नहीं आते हैं। श्रेष्ठ साधु ही अहिंइद्र बनते हैं।
गृहस्थ के आवश्यक देव पूजा,आचार्य उपाध्याय साधु की सेवा,स्वाध्याय, संयम, तप, दान है।
श्रावक का परम धर्म साधु को आहार बनाकर देना है परंतु साधु का धर्म आहार बनाना नहीं केवल आहार ले सकते हैं। श्रावक भी देव वंदना करके, सूर्योदय के बाद आहार बनाते हैं श्रावक के भोजन बनाने का कार्य पूर्ण हो जाता है धुआ आदि नहीं आता है रोगी तथा बच्चे भोजन करके खेलते हैं उसके बाद साधु आहार चर्या के लिए उठते हैं यह मुलाचार में लिखा है।
श्रावक स्वाध्याय नहीं के बराबर करते हैं परंतु साधु का प्रथम कर्तव्य स्वाध्याय करना है। साधु को सभी कार्य छोड़कर ज्ञानार्जन करना चाहिए। ध्यान अध्ययन साधु का प्रमुख कर्तव्य है।
जहां भी हो पूजा पाठ अभिषेक संबंधी विषमताए कूट-कूट कर भरी हुई है।
आचार्य श्री कहते हैं पहले मुनि धर्म का उपदेश दो मुनि धर्म पालन करो श्रावक यदि मुनि धर्म पालन नहीं कर सके तो फिर उसे श्रावक धर्म का उपदेश दो।
गृहस्थ भगवान का अवलंबन लेकर पूजा पाठ अभिषेक आदि करता है क्योंकि वह सारा दिन पाप कार्य ही करता है। साधु को इसकी आवश्यकता नहीं वह स्वयं पंच परमेष्ठी है। गृहस्थ के लिए तीर्थ यात्रा दान पूजा आदि है। भरत चक्रवर्ती ने कैलाश पर्वत पर सोने के मंदिर बनाये परंतु साधु बनने के बाद मंदिरों का भी त्याग कर दिया उसकी भी देखरेख की जिम्मेदारी का त्याग कर दिया।
साधु परमहंस है उन्हें किसी यज्ञ विधान पूजा की आवश्यकता नहीं।
चतुर्थ काल में भी साधु को सही नहीं समझा गया उन्हें मारा गया,पिटा गया।
आत्मा ही मेरा सब कुछ है तीर्थ यात्रा पूजा मैं ही हूं ऐसा साधु चिंतन करता है।
सातवी प्रतिमा धारी अपने पुत्र पुत्री की शादी भी नहीं करवा सकता है।
श्रावक गृहस्थ के कार्य में रात दिन लीन रहता है श्रावक के ध्यान को केंद्रित करने के लिए पूजा अभिषेक विधान आवश्यक है। गृहस्थ धर्म पालन करने के बाद उसे छोड़कर मुनि धर्म पालन करते हैं। आत्मा में लीन होने पर मोक्ष प्राप्त होता है। गृहस्थ धर्म तथा मुनि धर्म दोनों मोक्ष प्राप्ति में सहकारी है माध्यम है।
परमात्मा प्रकाश से आचार्य श्री ने बताया कि श्रावक धर्म परंपरा से मोक्ष मार्ग है। ना दिगंबर ना सितंबर ना जटा धारण करने वाले, ना कैशलौच करने वाले, केवल आत्मा में लीन होने वाले को ही मोक्ष प्राप्त होता है। चामुंडराय राजा ने बाहुबली भगवान की विशाल मूर्ति बनाई बड़ा घड़ा दूध लेकर अभिषेक किया परंतु उसका अभिषेक भगवान पर नहीं हुआ एक गरीब बुढिया के छोटे से कलश भरकर दूध से भगवान का अभिषेक हो गया। भावों की पवित्रता का खेल है।
आचार्य श्री ने अपने ग्रंथ में लिखा है। सुलझे पशु, प्रभुउपदेश सुन, क्यों न सुलझे कुमार।
स्वर्ग के सामान्य देव अपने विमान के देवों को कुल देवता मानकर दर्शन पूजा करते हैं परंतु मिथ्या दृष्टि ही रहते हैं। ये जानकारी
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here