प्रज्ञाहीन, विवेकहीन व्यक्ति अंधे के समान है…वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव………………..
अजीत कोठिया डडूका बांसवाड़ा राजस्थान की रिपोर्ट
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विश्व धर्म प्रभाकर वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव ने पुनर्वास कॉलोनी से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि प्रज्ञाहीन, विवेकहीन अंधे के समान है जिस प्रकार समतल अच्छा दर्पण होने पर भी अंधा नहीं देख सकता वैसे ही विवेकाध, स्वार्थाधं, कामाधं कुछ भी नहीं देखता है।
संकीर्ण स्वार्थ पूर्ण धर्म से अनर्थ अधिक होता है। विवेक से हित अहित का ज्ञान होगा। पथ्य भोजन भी अपच से रोग कारक, अपथ्य बन जाता है वैसे ही रटन्त धार्मिक ज्ञान से आत्महित नहीं होता अधिक घमंड आ जाता है जो पतन का कारण है। बुद्धि स्वयं की घातक होती है जो दूसरों को ज्यादा गलत सिद्ध करते हैं वह अधिक घातक है। संयमहीन जो भी आचरण है वह निरर्थक है। तत्वार्थ श्रद्धान सम्यक दर्शन है। सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान सम्यक चारित्र तीनों का सम्यक समन्वय ही धर्म है। चरित्रहीन क्रिया व्यर्थ है।
भाव होने पर संयोग अवश्य होगा। नई पीढी में ज्यादा भावात्मक क्रांति हो रही है।पुण्य से सब संपदा प्राप्त होती है। सम्यक दृष्टि सप्त भय से रहित होता है संसार शरीर भोगों से विरक्त रहता है। आकाश में ही समस्त पुण्य होता है परंतु आकाश को पुण्य नहीं लगता आकाश में ही सभी सिद्ध भगवान विराजमान है मोक्ष होता है परंतु आकाश को नहीं। सभी प्रकार के पाप भी आकाश में ही होता है परंतु आकाश को पाप नहीं लगता है। बहिरंग त्याग तपस्या सब अंतरंग की विशुद्धि के बिना निष्फल है।
भोजन अधिक चबाकर खाने से बुद्धि बढ़ती है। श्रवण करने के बाद चिंतन मनन मंथन अधिक गुणकारी है। भाव रहित कोई सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता है मानसिक शांति भी नहीं प्राप्त कर सकता है।
तप शब्द का सबसे ज्यादा दूर्उपयोग होता है। करोड़ ×करोड़ करोड़ के आगे 40 जीरो लगाने पर कोटी बनता है। करोड़ो भवो में तप करने पर भी जन्म-जन्मांतर तप करने पर भी केवल शारीरिक कष्ट देने से कर्म निर्जरा नहीं होती है। यह छाया को ही शरीर मानना तथा सर्प जाने के बाद रेखा को सर्प मानने जैसा है.। यदि कोई साधु भाव अशुद्ध रखकर बाहरी परिग्रह का त्याग करें तो भी व्यर्थ है।भावहीन साधु का बाह्य परिग्रह त्याग कुछ नहीं कर सकता है. त्याग भोग निमित्त, अहंकार निमित्त लोभ निमित्त बने तो निष्फल है। भाव प्रथम है जिस प्रकार एक के बिना कितने भी शुन्य लगा दें कोई मूल्य नहीं होगा.।
आचार्य श्री मोक्षा पथिक को इसलिए ही कहते हैं तू भाव को ही जान। संसारी जीव शुभ भाव के बिना ही चारों गतियो में भ्रमण करता है. आचार्य ऋषि कहते हैं तुम्हारी चतुराई भाव को जाने बिना व्यर्थ है भाव को भी शिवपुरी का मार्ग बताया है।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी मैं आचार्य श्री द्वारा रचित कविता कितना प्यारा भाव है मेरा,मेरा आत्मविश्वास ज्ञान चरित्र वाला। तुम्हारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।
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