“पहले स्वयं का कल्याण करो, फिर दूसरों का सोचो”
“जलो मत, जलाओ मत, दीप की तरह जलो” : आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज
“संयम-साधना, सत्य-अहिंसा ही जीवन का सार”
राजेश जैन दद्दू
दिल्ली/इंदौर। दिगम्बर जैन श्रमण संस्कृति के महामहिम उन्नायक आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने ऋषभोदय जैन मंदिर में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि सुखद अनुभूति प्राप्त करनी है तो दूसरों की गलती मत देखो। दूसरों के सुधार में अपना अमूल्य समय व्यतीत मत करो। पहले स्वयं का कल्याण करो, फिर दूसरों का सोचो।
आचार्य श्री ने कहा “शास्त्र बहुत हैं, विद्यायें अनंत हैं, शक्ति अल्प है, सामर्थ्य कम है, आयु थोड़ी है। इसलिए गुरु-उपदेश से, आगम पारायण से इतना समझ लो कि मैं भिन्न हूँ, मेरे भिन्न हैं। आत्मा का स्वभाव परभावों से अत्यन्त भिन्न है।”
क्या सार? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए गुरुदेव ने कहा गुरु वचन ही सार है। संयम-साधना ही सार है। सत्य-अहिंसा, दया-करुणा ही सार है।
“जलो मत, जलाओ मत” विषय पर उन्होंने कहा कि दूसरों की उन्नति और सफलता पर जलो मत, ईर्ष्या मत करो। “जलना है, तो दीप की तरह जलो। स्वयं भी प्रकाशित रहो, दूसरों को भी प्रकाशित करो।”
क्या सुन्दर? क्या असुन्दर?
आचार्य श्री ने समझाया “वस्तु तो जैसी है, वैसी ही है। न कोई वस्तु सुन्दर है, न असुन्दर। जिस वस्तु एवं व्यक्ति से जिसकी प्रीति होती है, उसमें व्यक्ति का राग होता है और वह उसे श्रेष्ठ लगती है।”
क्या अमृत? क्या जहर?
गुरुदेव ने कहा “कषाय परिणति, कषायपूर्ण भाव, वासना, क्रूर परिणाम, ईर्ष्या-कलह ही विष हैं। आपका विशुद्ध भाव, विशुद्धि, संयम, वीतराग परिणति ही अमृत है। विनय, विवेक, परोपकार और गुरु-वचन ही अमृत हैं।”
“शनैः पंथः, शनैः शनैः”
आचार्य श्री ने जीवन का सूत्र देते हुए कहा “एक-एक कदम बढ़ाते-बढ़ाते मंजिल पर पथिक पहुँच जाता है और एक-एक पृष्ठ पढ़ते-पढ़ते ग्रन्थ पूर्ण हो जाता है। धैर्यपूर्वक कार्य करो, सफलता अवश्य मिलेगी। बढ़ते चलो, रुको मत, थको मत।”
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे। सभी ने गुरुदेव के वचनों को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।
देशनाचार्य: दिगम्बर जैन संत आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज
नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु
राजेश जैन दद्दू














