गुरुवाणी प्रवचन
राजेश जैन दद्दू
1109 2026 ऋषभोदय दिल्ली
पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने धर्म सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि-
जीवन में अपनी योग्यताएँ बढ़ाना चाहिए, परन्तु किसी योग्य-व्यक्ति का तिरस्कार करके, किसी पद को छीनना मानवता नहीं है।
धर्मव्यवहार सिखाता है, भगवान् बनाता है
सच्चा-धर्म नही है, जो सद-व्यवहार सिखाए, धर्म-मार्ग पर लगाए, कर्म का क्षय करे, प्रशस्त परिणामों में लगाए, सुख शांति प्रदान करे और भगवान् बनाए । धर्म-ही संसार में सर्व-श्रेष्ठ है। धर्म ही मंगल है, धर्म उत्तम है, धर्म ही शरण है। धर्म-ही सर्व-श्रेष्ठ है।
पृच्छना-देशना
परिणाम सँभालो, भगवान बनो
मानव को अपने भाव सँभालना चाहिए। जो अपने भावों की विशुद्धि को संभाल लेगा वही भगवान् बनेगा। परिणाम बिगडते ही भाषा बिगड़ने लगती है। आन्तरिक भावों के अनुसार ही भाषा होती है। जो अपने भाव एवं भाषा को संभाल लेता है, उसका इह-भव एवं पर-भव सँभल जाते हैं।
जिनको यशः कीर्ति चाहिए उन्हें गुरुओं की भक्ति करना चाहिए। बलिष्ट शरीर चाहिए तो गुरुओं की सेवा करना चाहिए। दान दोगे, तो धन बढ़ेगा। ज्ञान दोगे, शान बढ़ेगा। कुए से पानी निकालोगे तो और पानी बदेगा। ऐसे ही अच्छा करोगे, अच्छा होगा।












