मासोपवासी समाधिसम्राट आचार्यश्री सुमतिसागर जी महाराज : जीवन परिचय

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मासोपवासी समाधिसम्राट आचार्यश्री सुमतिसागर जी महाराज : जीवन परिचय
समाधि दिवस 3 अक्टूबर पर विशेष आलेख

मुरैना (मनोज जैन नायक) मध्य प्रदेश के मुरैना जिले की माटी में जन्मे, कठोर तप, त्याग, संयम और आत्मसाधना के अद्भुत साधक आचार्य श्री 108 सुमतिसागर जी महाराज बीसवीं शताब्दी के प्रमुख दिगंबर जैन आचार्यों में गिने जाते हैं। वे शांत, गंभीर, सरल एवं तपस्वी व्यक्तित्व के धनी थे। मासोपवास जैसी कठिन तप साधनाओं के कारण उन्हें ‘मासोपवासी’ तथा समाधिपूर्वक देह त्याग के कारण ‘समाधिसम्राट’ के रूप में श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है। प्रकाशित स्मृति-ग्रंथ के अनुसार वे उत्तर भारत की शांतिसागर छाणी परंपरा के पंचम पट्टाचार्य थे।
जन्म एवं बाल्यकाल
आचार्यश्री सुमतिसागर जी महाराज का जन्म विक्रम संवत 1974, आसोज शुक्ल चतुर्थी, 20 अक्टूबर 1917 को मध्यप्रदेश के वर्तमान मुरैना जिले के श्यामपुरा ग्राम में हुआ। उनका जन्मनाम नत्थीलाल जैन था। पिता श्री छिद्दूलाल जी जैन तथा माता श्रीमती चिरोंजाबाई जैन थीं। वे जैसवाल जैन समाज के भंडारी गोत्र से संबंधित थे।
उनके परिवार में धार्मिक संस्कारों का विशेष प्रभाव था। माता-पिता ने बाल्यकाल से ही उन्हें धर्म, संस्कार, संयम और सदाचार का पाठ पढ़ाया। नत्थीलाल जी के तीन भाई और एक बहन थी। उनके छोटे भाई आगे चलकर आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज के रूप में प्रसिद्ध हुए।
बाल्यकाल से ही नत्थीलाल जी का स्वभाव शांत, गंभीर, सुशील और एकांतप्रिय था। उनमें सांसारिक विषयों की अपेक्षा धर्म एवं आत्मचिंतन के प्रति विशेष रुचि दिखाई देती थी।
गृहस्थ जीवन
लगभग बारह वर्ष की आयु में उनका विवाह मुरैना जिले के खबरोली निवासी श्री रामचंद्र जी की सुपुत्री श्रीमती रामश्री देवी के साथ हुआ। विवाह के बाद वे मुरैना आकर रहने लगे और कुछ समय तक खाद्यान्न के व्यापार से जुड़े रहे। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी उनका मन धीरे-धीरे धर्म, स्वाध्याय और वैराग्य की ओर बढ़ता गया। प्रकाशित जीवन-वृत्त भी उनके गृहस्थ जीवन, मुरैना में निवास और व्यापार का उल्लेख करता है।
आचार्य विमलसागर जी महाराज से मिला जीवन का निर्णायक मोड़
उनके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन तब आया, जब परमपूज्य आचार्य श्री 108 विमलसागर जी महाराज का मुरैना आगमन हुआ। नत्थीलाल जी के परिवार को आचार्यश्री को आहार कराने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
आहारदान के उस अवसर ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। आचार्यश्री के तप, त्याग, संयम और साधना से प्रभावित होकर नत्थीलाल जी के भीतर वैराग्य की भावना प्रबल होती गई। उन्होंने क्रमशः अनेक व्रत ग्रहण किए और सांसारिक मोह-ममता से अपने मन को दूर करते हुए आत्मकल्याण की साधना को जीवन का लक्ष्य बना लिया।
उनकी पत्नी श्रीमती रामश्री देवी ने भी उनके वैराग्य भाव को समझते हुए त्याग और संयम के मार्ग में सहयोग दिया। जीवन-वृत्त में उनके द्वारा शुद्ध जल के त्याग के प्रसंग का विशेष रूप से उल्लेख मिलता है।
ऐलक दीक्षा
लगातार बढ़ती वैराग्य भावना के फलस्वरूप नत्थीलाल जी ने विक्रम संवत 2025, चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, वर्ष 1968 में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज से ऐलक दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के बाद उन्हें ऐलक श्री वीरसागर जी महाराज नाम प्राप्त हुआ।
मुनि दीक्षा एवं ‘सुमतिसागर’ नाम
ऐलक अवस्था में उन्होंने कठोर संयम, स्वाध्याय और तपस्या का जीवन अपनाया। इसके पश्चात गाजियाबाद में वर्ष 1968 में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज से उन्होंने मुनि दीक्षा ग्रहण की और उन्हें मुनि श्री 108 सुमतिसागर जी महाराज नाम प्राप्त हुआ।
मुनि जीवन में उनका व्यक्तित्व और अधिक निखरता गया। वे गहन अध्ययन, ध्यान, तप और आत्मचिंतन में निरंतर प्रवृत्त रहने लगे। उन्होंने देश के विभिन्न भागों में विहार कर जैन धर्म, अहिंसा, अनेकांत, संयम और आत्मकल्याण का संदेश जन-जन तक पहुंचाया।
आचार्य पद की प्राप्ति
आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज को आगे चलकर आचार्य पद से विभूषित किया गया। उपलब्ध संदर्भों के अनुसार 13 अप्रैल 1973 को मुरैना में आचार्य श्री विमलसागर जी महाराज ने उन्हें आचार्य पद प्रदान किया।
आचार्य पद ग्रहण करने के बाद उन्होंने शांतिसागर छाणी परंपरा की साधना, तप और धर्मप्रभावना को आगे बढ़ाया। उनका जीवन कठोर संयम, गहन स्वाध्याय और आत्मानुशासन का उदाहरण बन गया।
कठोर तपस्या और ‘मासोपवासी’ की उपाधि
आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज की साधना का सबसे विशिष्ट पक्ष उनकी कठोर तपस्या थी। वे लंबे-लंबे उपवास और कठिन व्रत करते थे। अनेक अवसरों पर उन्होंने मासोपवास जैसी कठिन साधनाएं कीं। इसी कारण श्रद्धालु उन्हें प्रेम और श्रद्धा से ‘मासोपवासी समाधिसम्राट आचार्य श्री सुमतिसागर जी महाराज’ के नाम से स्मरण करने लगे। उनके जीवन का मूल उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने की दिशा में साधना करना था।
धर्मप्रभावना एवं समाज सेवा
आचार्यश्री ने अपने जीवनकाल में देश के विभिन्न राज्यों में विहार किया और जैन धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार किया। उनके सान्निध्य में अनेक पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएं हुईं तथा अनेक स्थानों पर वेदी प्रतिष्ठाओं और धार्मिक आयोजनों को प्रेरणा मिली।
शिष्यों को दी संयम मार्ग की शिक्षा
आचार्यश्री ने अपने जीवनकाल में अनेक साधु-साध्वियों और श्रावकों को धर्ममार्ग की प्रेरणा दी। लगभग 50 व्यक्तियों को दीक्षा देकर उन्हें संयम के मार्ग पर अग्रसर करने का उल्लेख उनके जीवनवृत्त में मिलता है। उन्होंने अपने शिष्यों में स्वाध्याय, तप, विनय, अनुशासन और आत्मकल्याण की भावना विकसित की । उनके प्रमुख शिष्यों में विद्याभूषण सन्मति सागर महाराज, सराकोद्धारक ज्ञानसागर महाराज एवं ज्ञेय सागर महाराज जैसे प्रतिष्ठित साधु-संत हुए। उनके गुरु-शिष्य संबंध में ज्ञान और साधना की परंपरा को विशेष महत्व प्राप्त था।
सोनागिरि में समाधिमरण
जीवन के अंतिम समय में भी आचार्यश्री अपनी साधना के प्रति पूर्ण सजग रहे। उन्हें अपने समाधि समय का पूर्वाभास होने का उल्लेख मिलता है। उन्होंने साधु-संघ को संकेत दिया कि शरीर और आत्मा की अंतिम यात्रा निकट है।
3 अक्टूबर 1994 को मध्यप्रदेश के प्रसिद्ध सिद्धक्षेत्र सोनागिरि में प्रातः लगभग 9:30 बजे उन्होंने नश्वर शरीर का त्याग कर समाधिमरण प्राप्त किया। इस प्रकार लगभग 77 वर्ष के जीवन में उन्होंने गृहस्थ से साधु और साधु से आचार्य बनने तक की आध्यात्मिक यात्रा पूर्ण की।

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