मन्दिर भगवान को धन्यवाद देने का पवित्र स्थान है,लेकिन हमने उसे माँगने का कार्यालय बना दिया है..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

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औरंगाबाद नरेंद्र पियुष जैन  परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज की अहिंसा संस्कार पदयात्रा दिक्षा भुमी परतापुर बांसवाड़ा राजस्थान में विराजमान हैं उनके सानिध्य में वहां रोज़ विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं उसी श्रुंखला में आज उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज ने कहा कि।    आपने कभी ध्यान दिया होगा — जब विवाह होता है, तब लड़का लड़की की केवल एक बार माँग भरता है, और उसके बाद लड़की जीवनभर पति से माँग करती रहती है। आदमी जीते-जी स्त्री की सभी माँगें पूरी नहीं कर पाता। जब भी पति घर जाता है, पत्नी कहती है — अरे सुनो जी! हमारी माँग पूरी करो। और जब पति उसकी माँग पूरी नहीं कर पाता, तब पत्नी कहती है — किसने कहा था मेरी माँग भरने को-? अब भरी है तो पूरी भी करो। यही कारण है कि आदमी जीवनभर माँगों को पूरा करने में लगा रहता है।
सुख-दुःख और कुछ नहीं, सब मन का समीकरण है। जब मन प्रसन्न होता है, तो घर भी स्वर्ग जैसा लगने लगता है, और जब मन दुःखी व परेशान होता है, तो घर से बड़ा नरक कहीं दिखाई नहीं देता। इसलिए हजारों प्रश्नों का एक ही समाधान है — मन। मानव का मन किसी प्रयोगशाला से कम नहीं है। मन समुद्र की लहरों की तरह होता है, जिसमें इच्छाएँ निरन्तर नृत्य करती रहती हैं। मन चन्द्रमा की भाँति घटता-बढ़ता रहता है — कभी अच्छा सोचता है, कभी बुरा; कभी सकारात्मक विचारों से भर जाता है, तो कभी नकारात्मकता से। आज के मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह जल्दी गलत सोचने लगता है, और वैसे भी आदमी अपनी औकात से अधिक सोचता है।
किसी विचारक ने बहुत सुंदर लिखा है — हम मनुष्य हैं, इसलिए सोचते हैं; यदि गधे होते, तो नहीं सोचते।
आचार्यों ने मन के अनेक लक्षण बताए हैं। उन्होंने मन को बन्दर के समान चंचल और अंगद के पैर के समान अडिग बताया है। संसार के सभी संकल्प और विकल्प मन से ही संचालित होते हैं।
इसलिए —
एक मन को साध लो, तो सब कुछ सहज हो जाएगा..*
अन्यथ: यही मन जीवन जीना हराम कर देगा…!!!            नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद

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