कोटा में कोचिंग से कैसे बचे ?

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बात अपने बचपन की करते हैं जब हम लोग सरकारी प्राथमिक स्कूल में पढ़कर हीगेटर सेकेंडरी स्कूल से गणित विषय में पास होकर जीव विज्ञानं लेकर बी ऐस सी प्रथम वर्ष पास कर चिकित्सा क्षेत्र में आकर चिकित्सक बना और प्रथम श्रेणी अधिकारी से सेवा निवृत्त हुआ और अब सेवा निवृत्ति का जीवन यापन कर रहा हु। मेरी कुल पढाई में मात्र दोहज़ार पांच सौ रुपये खरच हुए और डॉक्टर बन गए। उस समय हमारे कॉलेज स्कूल में अध्ययन अध्यापन नियमित हुआ करता था और घरों में अनुशासन रहता था।
जीवन में सबको दिन रात में चौबीस घंटे मिले हैं और उनका विभाजन हम इस प्रकार करे –८ घंटे कॉलेज स्कूल में पढाई ,आठ घंटे सोना ,चार घंटे खेल कूद के बाद चार घंटे यदि ईमानदारी से पढाई नियमित करे तो बहुत सीमा तक सफलता मिल सकती हैं। हमारे जमाने में टूशन पढ़ने वाले छात्र कमजोर और गधे समझे जाते थे ,अब कोचिंग एक प्रतिष्ठा मानी जाने लगी।
नियमित चार घंटे को विभाजित कर सब विषयों के नोट्स बनाये और लेखन क्रिया करे जिससे अक्षरों में सुधार  के साथ हमेशा के लिए अपनी याद में रहेगा ,आजकल गणित विषय पढ़ा जाता हैं उसका अभ्यास नहीं करते ,इसके बाद जो पढाई स्कूल कॉलेज में हुई उसको नित्य पूरा कर कल क्या पढ़या जायेगा उसका हल्का फुल्का देखकर जाए और इसके बाद हर सप्ताह जितनी पढाई हुई हैं उसका रिवीजन करे। यह सब काम घर और कॉलेज में किया जा सकता हैं। जितना पैसा कोचिंग में खर्च करते हैं उसका  उपयोग फल मेवा और पौष्टिक आधार पर खर्च करेंगे तो आपको निराशा के साथ आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता आएँगी।।
एक विचारणीय बिंदु यह भी हैं ,मानलो हर छात्र की पढाई का खरच ६ हज़ार  रूपयाप्रति माह  हैं यानी दो सौ रूपया रोज ,यानि २४ घंटे में २०० रूपया ,एक घंटे का व्यय १० रूपया ,यदि वह छात्र कोचिंग के अलावा गप्पे ,करना ,पिक्चर देखना ,सोना ,पढाई में खर्च करता हैं यानी वह एक घंटे का खर्च १० रूपया करता हैं। यदि इस आर्थिक गणित को समझे और धन का मूल्य समझे तो बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता हैं। आज यह कहना हैं की प्रतिस्पर्धा के साथ पढाई बहुत  हैं। पढाई आपके के कोर्स से ही आएंगी अलग से कुछ नहीं होता।
आज कोटा किस जाते हैं पढ़ने, सीखने या मरने। ,लाखों रूपया खर्च कर सुबह से शाम तक लगभग १२ घंटे पढाई करना उसके बाद थकने के कारण आराम करना, खाना खाना और सोना ,रिवीजन करने का समय नहीं। हर दिन ,हर सप्ताह टेस्ट परीक्षा होने से उसमे सफल अंक नहीं मिलने पर निराशा ,कच्ची उम्र के लड़के लड़किया अकेले हॉस्टल में रहना ,जैसा भी खाना मिले खाओ और यदि गलत संगत  मिल गयी तो झूठ का सहारा लेकर अपनी पढाई करना। और फिर निराशावादी होकर अवसाद तनाव में रहना और लगातार स्थिति होने पर आत्महत्या करना।
माता पिता अपने सामने अपनी संतानों को अनुशासन में रखकर पढ़ाये और यदि उचित समझे स्थानीय स्तर पर कोई मार्गदर्शक से मार्गदर्शन लिया जा सकता हैं। इसके साथ बच्चों को अनुशासन में रखकर नियमित उतनी लगन से पढ़ाई करेंगे तो ऐसी कोई भी कठिनाई नहीं होंगी। अनुशासन ,नियमितता ,अभ्यास से संभव हैं। ऐसा नहीं हैं की काबुल में घोड़े ही घोड़े होते हैं ,गधे नहीं होते। यदि कोटा में पढ़ने वालों की संख्या और सफल होने वाले बच्चों का प्रतिशत कितना हैं तो मात्र ५ प्रतिशत होता हैं ,उन पर खर्च लाखों रुपयों के खरच और तनाव झेलना पड़ता हैं।
प्रतिस्पर्धा में सफलता की लालच के कारण अंधी दौड़ में दौड़ कर अपना भविष्य बनाने मरगजाल में फंस कर अपना अंत कर लेते हैं। यदि उपरोक्त साधनो  का उपयोग करके घर में सुख साधन रहकर उच्च अध्ययन कर सकते। बस नित्य अध्ययन ,अनुशासन और आत्म नियंत्रण से सफलता आपके कदम छू सकती हैं।
विद्यावाचस्पति डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन   संरक्षक शाकाहार परिषद् A2 /104  पेसिफिक ब्लू ,नियर डी मार्ट, होशंगाबाद रोड, भोपाल 462026  मोबाइल  ०९४२५००६७५३

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