कर्मों की गति न्यारी:- उपाध्याय विशेषसागर

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भगवान महावीर स्वामी ने अपनी दिव्य देशना में कहा था कि व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान होता है जैन कुल में जन्म लेने मात्र से कोई जैन नहीं होता, जो नित्य देव दर्शन करता है, रात्रि भोजन का त्यागी हो, पानी छानकर पिता हो वहीं जैन कहलानें का अधिकारी है | उक्त उद्‌गार प. पू विराग कीर्ती उपाध्याय श्री 108 विशेषसागर जी गुरुदेव ने श्री 1008 पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बडा मंदिर में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा।

पू. उपाध्याय श्री ने आगे कहा अच्छे भावों का फल कभी बुरा नहीं होता और बुरे भावों का फल कभी अच्छा नहीं होता, एक व्यक्ति से समाज – परिवार का नाम होता व एक व्यक्ति से परिवार व समाज का नाम बदनाम होता है, एक व्यक्ति से समाज को धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने का ,गुरुओं की सेवा करने का अवसर प्राप्त होता है और एक व्यक्ति के चलते हाथ में आया हुआ अवसर भी चला जाता है।

जैन धर्म कर्म सिंद्धांत धर्म है, इस कर्मो ने तीर्थकरों को भी नहीं छोड़ा, व्यक्ति हंसते हुए कर्मो का बंध करता है पर जब उदय में आता है तो खुन की आँसु बहाना पड़ता है, कर्मों की गति न्यारी है। किसी से डरो चाहे मत डरो पर कर्मो से अवश्य डरो

दिगम्बर अंत 8 माह पद विहार करते है 4 माह चातुर्मास में एक जगह रुक कर योग धारण कर विशेष साधना करते है, श्रावकों को सेवा- वैय्यावृ‌त्ति कर‌ने का अवसर प्राप्त होता है, जिस समाज को चातुर्मास कराने का अवसर प्राप्त होता है वह समाज अपने को धन्य मानती है, कुशल व्यापारी 8 माह धन कमाता और 4 माह धर्म करता है | पथरिया वासि सौभाग्य शाली है आपको चातर्मास कराने का अवसर प्राप्त हो रहा है। तैयार हो जाये, मन बना हैं चातुर्मास में क्या करना है कमाया हुआ धन तो यहीं रहने वाला है साथ में जाने वाला अपना कर्म है।

विनोद रोकडे जैन मालेगांव

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