कर्म किसी से भेदभाव नहीं करता, जैसा कर्म वैसा फल : आचार्य विहर्ष सागर महाराज

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कर्म किसी से भेदभाव नहीं करता, जैसा कर्म वैसा फल : आचार्य विहर्ष सागर महाराज

ब्यावर। परम पूज्य आचार्य श्री 108 विहर्ष सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि संसार में लोग अलग-अलग धर्म, जाति, भाषा और परंपराओं से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन कर्म सिद्धांत सभी के लिए समान है। कर्म कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं करता। प्रत्येक व्यक्ति को अपने किए हुए कर्मों के अनुसार ही सुख और दुख का अनुभव करना पड़ता है। जो जैसा करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।

धर्मसभा के प्रारंभ में दिगंबर जैन पंचायत के अध्यक्ष सुशील बड़जात्या एवं समाज के प्रबुद्ध जनों द्वारा आचार्य श्री 108 विराग सागर जी महाराज एवं आचार्य श्री 108 विशुद्ध सागर जी महाराज के चित्रों का अनावरण किया गया। इसके पश्चात श्रद्धाभाव के साथ आचार्य श्री 108 विहर्ष सागर जी महाराज का पाद प्रक्षालन किया गया। धर्मसभा में बाहर से पधारे हुए अतिथियों का भी समाज की ओर से स्वागत एवं सम्मान किया गया।

आचार्य श्री ने कहा कि कर्म का नियम इतना अटल और प्रभावशाली है कि वह किसी को भी नहीं छोड़ता। इसे समझाते हुए उन्होंने भगवान ऋषभदेव का प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि जब लोगों ने भगवान ऋषभदेव से शिकायत की कि बैल खेतों की फसल खा जाते हैं, तब भगवान ने उन्हें बैलों के मुख पर जाली बांधने की सलाह दी। उसी कर्म के उदय के कारण भगवान ऋषभदेव को 13 माह 9 दिन तक आहार प्राप्त नहीं हुआ। इससे स्पष्ट होता है कि कर्म का प्रभाव भगवान तक को नहीं छोड़ता, तो सामान्य मनुष्य की क्या बात है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों के प्रति सदैव सजग रहना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जीवन में प्राप्त होने वाले सुख और दुख हमारे अपने कर्मों का परिणाम हैं। अच्छे कर्म जीवन को ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं, जबकि बुरे कर्म पतन का कारण बनते हैं। इसलिए मनुष्य को सदैव सद्कर्मों की ओर अग्रसर रहना चाहिए।

प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने एक प्रेरक कथा के माध्यम से कर्म और व्यक्तित्व की महत्ता को समझाया। उन्होंने बताया कि एक प्रसिद्ध चित्रकार को एक मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का चित्र बनाने का कार्य मिला। चित्रकार ने एक सुंदर, निष्कपट और तेजस्वी बालक को सामने बैठाकर भगवान श्रीकृष्ण का चित्र बनाया। लगभग 25 वर्ष बाद जब उसी चित्रकार को कंस का चित्र बनाने का कार्य मिला, तो उसने एक अत्यंत क्रूर और भयावह दिखने वाले व्यक्ति को मॉडल के रूप में चुना।

चित्र बनने के बाद वह व्यक्ति भावुक हो गया और उसने चित्रकार को बताया कि वर्षों पहले भगवान श्रीकृष्ण के चित्र के लिए चुना गया बालक वही था। समय के साथ गलत संगति और बुरे कर्मों के कारण उसका जीवन बदल गया और आज वह कंस के रूप में चित्रित किया जा रहा है। इस प्रसंग के माध्यम से आचार्य श्री ने कहा कि इंसान और शैतान दोनों हमारे भीतर ही मौजूद हैं। हमारे विचार, संस्कार और कर्म ही तय करते हैं कि हम किस दिशा में आगे बढ़ेंगे। अच्छे कर्म हमें देवत्व की ओर ले जाते हैं और बुरे कर्म पतन की ओर।

आचार्य श्री ने कहा कि सभी धर्मों में शास्त्र और ग्रंथ इसलिए बनाए गए हैं ताकि मनुष्य अपने जीवन का सही मार्ग पहचान सके। प्रत्येक धर्म के ग्रंथ आत्मचिंतन और आत्मसुधार का संदेश देते हैं। उन्होंने कहा कि संसार का सबसे बड़ा और सहज उपलब्ध ग्रंथ “दर्पण” है। दर्पण हर स्थान पर उपलब्ध है और हमें हमारी वास्तविकता दिखाता है।

उन्होंने दर्पण की विशेषता बताते हुए कहा कि दर्पण सबका स्वागत करता है, लेकिन किसी का संग्रह नहीं करता। उसके सामने जो भी जाता है, वह बिना किसी भेदभाव के उसका प्रतिबिंब दिखाता है। न वह किसी से राग करता है और न किसी से द्वेष। यही समभाव का संदेश सभी धर्मग्रंथों का सार है। मनुष्य को भी दर्पण की तरह निष्पक्ष, निर्मल और समभावी बनने का प्रयास करना चाहिए।

इस अवसर पर आचार्य श्री विहर्ष सागर जी महाराज के शिष्य मुनि श्री विजयेश सागर जी महाराज ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए दान धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दान केवल धन का नहीं होता, बल्कि समय, सेवा, ज्ञान, सहयोग और सद्भाव का दान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दान मनुष्य के भीतर त्याग, करुणा और परोपकार की भावना को जागृत करता है। दान से व्यक्ति का अहंकार कम होता है तथा पुण्य का संचय होता है। मुनिश्री ने कहा कि निष्काम भाव से दिया गया दान ही वास्तविक दान है।
प्रवक्ता राकेश जैन ने बताया कि आचार्य श्री के मंगल सान्निध्य में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु धर्मसभा में पहुंचकर दर्शन एवं प्रवचन का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। समाज द्वारा विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जिनमें स्थानीय एवं बाहर से आने वाले श्रद्धालु उत्साहपूर्वक सहभागिता निभा रहे हैं। बाहर से पधारे हुए अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान भी किया गया।

प्रवचन के अंत में आचार्य श्री ने सभी को अच्छे विचार, श्रेष्ठ संस्कार और सद्कर्मों को अपनाने का संदेश देते हुए कहा कि कर्मों की शुद्धता से ही जीवन में सुख, शांति और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर आचार्य श्री एवं मुनि संघ के प्रेरणादायी प्रवचनों का लाभ प्राप्त किया।

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