जीवन-मरण की कला सिखाई ऋषभदेव ने – आचार्य अतिवीर मुनि

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जैन दर्शन के प्रथम तीर्थंकर देवाधिदेव श्री ऋषभदेव भगवान ने तीसरे काल के अंत में निर्वाण पद की प्राप्ति कर समस्त सांसारिक बंधनों से मुक्ति प्राप्त की| शाश्वत जन्मभूमि अयोध्या में राजा नाभिराय व माता मरुदेवी के आंगन में जन्म लेकर भगवान ऋषभदेव ने प्राणीमात्र का कल्याण किया| भारतवर्ष के स्वर्णिम इतिहास में जैन दर्शन का अमूल्य योगदान है| जब कल्पवृक्ष लुप्त होने लगे तो जनमानस को जीवनयापन की चिंता होने लगी| ऐसे समय में भगवान ऋषभदेव ने असि, मसि, कृषि, शिल्प, वाणिज्य व कला का अद्भुत ज्ञान प्रदान कर जीवन जीने की कला सिखाई| अपनी दोनों पुत्रियों, ब्राह्मी व सुंदरी, को अंक व लिपि का ज्ञान देकर महिला सशक्तिकरण का एहसास लोगों को करवाया| इसी कारण ब्राह्मी लिपि नामकरण हुआ| आपने न्याय व नीति पूर्वक राज्य कर समस्त सांसरिक सुखों से वैराग्य धारण कर कर्मों की निर्जरा हेतु जैनेश्वरी दीक्षा अंगीकार की तथा वन की ओर प्रस्थान किया| आपके साथ हजारों अन्य राजाओं ने भी आपके मार्ग का अनुसरण किया| दीक्षा लेते ही आपने मौन धारण कर लिया|

आप अपने आत्मसाधना में निरंतर आरूढ़ रहे परन्तु आपकी कठिन चर्या से च्युत होकर अनेक राजाओं ने अन्य मार्ग को अपना लिया| जैन मुनि की आहारचर्या का किसी को भी ज्ञान न होने से आपको आहार नहीं मिला और फिर जब आप हस्तिनापुर नगरी पहुंचे तो वहां के राजा श्रेयांस को जातिस्मरण से आहारचर्या का ज्ञान हुआ और उन्होंने आपको नवधाभक्ति पूर्वक इक्षुरस का आहार करवाया| तभी से वह दिन अक्षय तृतीया के रूप में लोकप्रचलित हुआ जो आज भी जनमानस मना रहा है| कैवल्यज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात् आपके दिव्य समवशरण का नगर-नगर में मंगल विहार हुआ तथा आपकी दिव्यवाणी से ज्ञानपिपासुओं की क्षुधा शांत हुई| जीवन के अंतिम पड़ाव में आप कैलाश पर्वत के उच्च शिखर पर ध्यानस्थ हुए जहाँ से आप समस्त कर्मों की निर्जरा कर परम पद में सदा के लिए अवस्थित हो गए| यह कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी कि आपने अपने आदर्श जीवन व सदुपदेशों से जीने व मरने की सम्यक कला का ज्ञान दिया| भगवान आदिनाथ के नाम से आपका उल्लेख लगभग सभी मान्यताओं के प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है|

आपके ज्येष्ठ पुत्र चक्रवर्ती भरत ने भी छह खण्ड के राज्य को त्याग कर जैनेश्वरी दीक्षा अंगीकार की तथा कर्मों की निर्जरा कर मोक्ष प्राप्त किया| इन्हीं चक्रवर्ती भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा, जिसका उल्लेख विष्णु पुराण में भी मिलता है| हमारे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू जी ने उड़ीसा स्थित खारवेल के शिलालेख पर “भरतस्य भारत” प्रशस्ति देख कर ही इस देश का संवैधानिक नाम भारत किया था| इज़राइल में भगवान ऋषभदेव के माता-पिता नाभिराय व मरुदेवी की पूजा अर्चना भक्तिपूर्वक की जाती है| आपके ही पुत्र बाहुबली ने कठोर तप कर सिद्धत्व की प्राप्ति की जिनकी 57 फ़ीट विशाल खड्गासन प्रतिमा कर्णाटक के श्रवणबेलगोला में उत्तुंग खड़ी है और विश्व को दिगंबरत्व का दिव्य सन्देश प्रदान कर रही है| प्रथम तीर्थंकर देवाधिदेव ऋषभदेव भगवान का मोक्ष कल्याणक दिवस जैन धर्मावलम्बियों के साथ-साथ समस्त देशवासियों के लिए हर्षोल्लास का प्रतीक है|

संकलन – समीर जैन (दिल्ली)

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