जैसे होंगे भाव, वैसे ही बंधेंगे कर्म : गणिनी आर्यिका श्री 105 गुरुनंदनी माताजी
भगवान की भक्ति केवल निमित्त, मोक्ष और सद्गति के लिए पुरुषार्थ स्वयं करना होगा; भावों की शुद्धता पर निर्भर है कर्मों का बंध
चेन्नई कंडीटोप मंदिर छत्रपति संभाजीनगर। गणिनी आर्यिका श्री 105 गुरुनंदनी माताजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि व्यक्ति के जैसे भाव और परिणाम होते हैं, उसी के अनुरूप कर्मों का बंध होता है। यदि परिणाम शुभ हैं तो शुभ कर्मों का बंध होता है और अशुभ परिणाम होने पर अशुभ कर्मों का बंध होता है। अनादिकाल से जीव को संसार में भटकाने वाले उसके अपने शुभ-अशुभ कर्म ही हैं। इसलिए जीवन में परिस्थितियों के लिए दूसरों को दोष देने के बजाय अपने भावों और पुरुषार्थ को समझना आवश्यक है।
माताजी ने कहा कि मनुष्य अक्सर अपनी परेशानी के लिए दूसरों पर आरोप लगाता है कि इनके कारण ऐसा हुआ अथवा भगवान ने हमारे साथ बुरा किया। जबकि वास्तविकता यह है कि कोई किसी के कर्मों का कर्ता-धर्ता नहीं है। भगवान की भक्ति हमें सही दिशा देने वाला निमित्त है, लेकिन अपने कर्मों में परिवर्तन के लिए पुरुषार्थ स्वयं करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि हमें नरक जाना है, निगोद में जाना है अथवा देवगति प्राप्त करनी है, यह हमारे भावों और कर्मों पर निर्भर करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने भावों को प्रशस्त और निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए। भावनाओं के माध्यम से जीव अपने भविष्य की दिशा निर्धारित कर सकता है। अपने पुरुषार्थ और परिणामों में परिवर्तन करके व्यक्ति पाप के बंध को पुण्य की दिशा में तथा पुण्य के अवसर को भी गलत भावों से पाप के बंध का कारण बना सकता है।
जैन धर्म में भावों की प्रधानता
गणिनी आर्यिका श्री 105 गुरुनंदनी माताजी ने भावों की प्रधानता समझाते हुए कहा कि जैन धर्म मूल रूप से भाव प्रधान धर्म है। किसी भी क्रिया का वास्तविक महत्व उसके पीछे छिपे भावों से निर्धारित होता है। मन, वचन और काय से होने वाली प्रवृत्तियों में मन के भावों की विशेष भूमिका होती है। उन्होंने बताया कि कर्मबंध के संदर्भ में मन की भूमिका लगभग 85 प्रतिशत, वचन की 12 प्रतिशत और काय की 3 प्रतिशत मानी गई है।
माताजी ने कहा कि केवल बाहरी क्रिया करने से उसका आध्यात्मिक लाभ नहीं मिलता। भावशून्य क्रिया फलदायी नहीं होती। इसलिए भगवान की पूजा, भक्ति, दान, साधु-संतों की सेवा अथवा कोई भी धार्मिक कार्य करते समय मन में श्रद्धा, विनय और निर्मल भाव होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि भगवान की भक्ति, दान-पुण्य और धार्मिक कार्य श्रद्धा एवं भक्तिपूर्वक शुभ भावों के साथ किए जाएं तो वे आत्मा के लिए कल्याणकारी बनते हैं। साधु को श्रद्धा और भक्तिपूर्वक आहार देने वाले श्रावक के भाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। धार्मिक क्रिया के पीछे की भावना ही उसके आध्यात्मिक परिणाम को प्रभावित करती है।
लक्ष्मी की नहीं, जिनेन्द्र भगवान की पूजा से पुण्य की वृद्धि करें
अंत में माताजी ने श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुण्य की वृद्धि करने का प्रयास करना चाहिए। केवल लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में वास्तविक समृद्धि प्राप्त नहीं होती। जिनेन्द्र भगवान की पूजन, आराधना और धर्म के प्रति श्रद्धा से जो पुण्यवृद्धि होती है, उससे आवश्यक लक्ष्मी और सुख-सुविधाएं भी निमित्त रूप में प्राप्त हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन में बाहरी परिस्थितियों को बदलने से पहले अपने भावों को बदलना आवश्यक है। शुभ भाव ही शुभ कर्मों के बंध का कारण बनते हैं और यही भाव जीव को उत्तम गति तथा आत्मकल्याण की दिशा में आगे ले जाते हैं। धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के परिणामों को निर्मल बनाकर आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने की दिशा में पुरुषार्थ करना है।आर्यिका माताजी का महापारणा १ अक्टूबर 2026 को चेन्नई कंडीटॉप मंदिर में होगा। ऐसी जानकारी प्रचार प्रसार संयोजक नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद ने दी है












