जैनत्व के संस्कार : विश्व विकास में वरदान – आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी
राजेश जैन दद्दू
किसी को बदनाम करना भी महापाप, जियो और जीने दो ही विश्व शांति का मूलमंत्र है – ऋष्योदय, दिल्ली में धर्मसभा
नई दिल्ली / ऋष्योदय तीर्थ। परम पूज्य दिगम्बराचार्य गुरुवर श्री 108 विशुद्ध सागर जी महामुनिराज ने आज दिनांक 10 सितम्बर 2026, ऋष्योदय, दिल्ली में धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैन धर्म के वैश्विक स्वरूप पर ओजस्वी प्रवचन दिया।
प्रवचन का मुख्य विषय रहा – “जैनत्व के संस्कार : विश्व विकास में वरदान”
आचार्य श्री ने कहा –
बद और बदनाम दोनों ही पाप –
जैन दर्शन में जीवों का ‘बद’ करना तो पाप है ही, पर किसी को ‘बदनाम’ करना भी महापाप कहा गया है। जैन धर्म पापी से घृणा नहीं करता, हम पापी को भी सुधरने का अवसर देते हैं। आत्म-हत्या भी पाप है और किसी की हत्या करना भी पाप है। जैन धर्म परस्पर सहयोग की बात करता है, सर्व जीवों पर दया और करुणा करने की शिक्षा देता है।
अहिंसा से ही विश्व एकता संभव –
तीर्थंकर महावीर की अहिंसा सम्पूर्ण विश्व में जानी जाती है। अहिंसा से ही विश्व-एकता और विश्व-शांति संभव है। जैनत्व के संस्कार सम्पूर्ण विश्व के लिए स्वास्थ्य, बुद्धि एवं आत्मशांति के लिए वरदान हैं।
स्वस्थ कैसे रहें – आचार्य श्री का सूत्र –
यदि प्रत्येक मनुष्य जीने के साथ-साथ सभी को शांति से जीने दे तो हिंसा नहीं होगी। पानी छानकर प्रासुक करके पियो, शुद्ध शाकाहारी भोजन करो तो जीवन भर स्वस्थ रहोगे। स्वस्थ जीवन होगा तो आयु बढ़ेगी, अपव्यय घटेगा तो लोग परस्पर लूट-पाट नहीं करेंगे। परस्पर एक-दूसरे का सहयोग करेंगे, प्रेम वात्सल्य से जीवन जियेंगे, मैत्री भावना रखेंगे तो घर-घर में, घट-घट में सुख-शांति का संचार होगा।
आकांक्षा छोड़ो, कर्तव्य करो –
“जियो और जीने दो” के सिद्धांत पर जियो। स्वयं शांति से जियो और दूसरों को शांति से जीने दो। जीना तुम्हारा अधिकार है, तो दूसरों को जीने देना तुम्हारा नैतिक कर्तव्य है। प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने नैतिक कर्तव्यों का पालन करे। हम यह न सोचें कि दुनिया ने हमारे लिए क्या किया, अपितु शांति चाहते हो तो यह सोचो कि हमने दुनिया के लिए क्या-क्या किया है।
जो नैतिकता के साथ जीवन जिये, सात्विक शाकाहार करे, अहिंसक वृत्ति रखे, जिनाज्ञा का पालन करे, वही सच्चा जैन है। जन-जन के कल्याण का धर्म है – जैन धर्म।
धर्मसभा में दिल्ली सहित देशभर से आये सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने आचार्य श्री के प्रवचनों का लाभ लिया।












