गुजरात के प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगर भरूच की जामा मस्जिद के लगभग 700 वर्षों से बंद तहखाने में मिलीं जैन प्रतिमाएं एवं विक्रम संवत 1213 का शिलालेख भारतीय इतिहास एवं जैन संस्कृति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण

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गुजरात के प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगर भरूच की जामा मस्जिद के लगभग 700 वर्षों से बंद तहखाने में मिलीं जैन प्रतिमाएं एवं विक्रम संवत 1213 का शिलालेख भारतीय इतिहास एवं जैन संस्कृति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण
गुजरात के प्राचीन एवं ऐतिहासिक नगर भरूच स्थित जामा मस्जिद के लगभग 700 वर्षों से बंद बताए जा रहे तहखाने में प्राचीन जैन प्रतिमाओं, जैन देवी-देवताओं की मूर्तियों तथा विक्रम संवत 1213 अंकित शिलालेख मिलने संबंधी समाचारों ने सम्पूर्ण जैन समाज के साथ-साथ इतिहासकारों, पुरातत्वविदों एवं सांस्कृतिक विरासत के अध्येताओं का ध्यान आकर्षित किया है। यह विषय केवल किसी एक धर्म या समुदाय से जुड़ा नहीं है, बल्कि भारत की प्राचीन सांस्कृतिक एवं धार्मिक विरासत के संरक्षण तथा ऐतिहासिक सत्य की खोज से भी संबंधित है।
प्राप्त समाचारों के अनुसार 10 जून, 2026 को भरूच स्थित ऐतिहासिक जामा मस्जिद के सीलबंद तहखाने के निरीक्षण के दौरान जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान श्री 1008 मल्लिनाथ स्वामी सहित अनेक जैन देवी-देवताओं एवं यक्ष-यक्षिणियों की प्रतिमियां प्राप्त हुई हैं। इन प्रतिमाओं में से एक पर विक्रम संवत 1213 (लगभग 1156 ईस्वी) अंकित होने का उल्लेख भी सामने आया है, जो इस स्थल की प्राचीनता एवं उसके ऐतिहासिक स्वरूप पर नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता को इंगित करता है।
यह खोज भारतीय इतिहास, जैन संस्कृति एवं प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस विषय पर पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक जांच जारी है तथा विशेषज्ञों द्वारा प्राप्त प्रतिमाओं, शिलालेखों एवं अन्य अवशेषों का परीक्षण किया जा रहा है। जैन समाज का मानना है कि निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक जांच के माध्यम से इस स्थल के वास्तविक इतिहास और स्वरूप को देश के समक्ष लाया जाना चाहिए।
यह विषय केवल आस्था का नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन विरासत, सांस्कृतिक पहचान एवं ऐतिहासिक तथ्यों के संरक्षण का भी है। अतः आवश्यक है कि इस प्रकरण की जांच पूरी पारदर्शिता, निष्पक्षता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से की जाए, जिससे ऐतिहासिक सत्य स्थापित हो सके और देश की बहुमूल्य सांस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रह सके।
श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री गजराज जैन गंगवाल ने इस विषय को अत्यंत गंभीर एवं महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यदि इन तथ्यों की पुष्टि पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक जांच में होती है, तो यह केवल जैन समाज के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए अत्यंत गौरवपूर्ण एवं महत्वपूर्ण खोज सिद्ध होगी। भारत की प्राचीन संस्कृति के अनेक अध्याय आज भी पुरातात्विक स्थलों एवं ऐतिहासिक संरचनाओं में छिपे हुए हैं, जिनका निष्पक्ष अध्ययन समय की मांग है।
महासभा (धर्म संरक्षिणी) के राष्ट्रीय महामंत्री श्री पवन जैन गोधा ने कहा कि भरूच प्राचीन काल से ही व्यापार, संस्कृति एवं जैन धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। अनेक ऐतिहासिक ग्रंथों, यात्रावृत्तांतों तथा स्थानीय परम्पराओं में इस क्षेत्र में जैन मंदिरों एवं जैन विहारों के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है। ऐसे में यदि पुरातात्विक जांच एवं ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह प्रमाणित होता है कि वर्तमान संरचना के नीचे अथवा उसके मूल स्वरूप में जैन धार्मिक स्थल विद्यमान था, तो यह भारतीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण खोज सिद्ध होगी।
महासभा के पदाधिकारियों ने कहा कि विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि यह स्थल प्राचीन “समारी विहार” नामक जैन धार्मिक स्थल था, जिसे इतिहास के विभिन्न कालखंडों में परिवर्तित किया गया। हालांकि इन दावों की सत्यता का निर्धारण केवल निष्पक्ष पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक जांच से ही संभव है।
वर्तमान में पुरातत्व विभाग द्वारा प्राप्त मूर्तियों, शिलालेखों एवं संरचनात्मक अवशेषों का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया जा रहा है तथा जांच रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गई है। यह आवश्यक है कि इस पूरे विषय की जांच राष्ट्रीय स्तर के पुरातत्व विशेषज्ञों, इतिहासकारों, अभिलेखविदों (Epigraphists) एवं जैन कला विशेषज्ञों की संयुक्त समिति से कराई जाए, जिससे किसी भी प्रकार की भ्रांति या विवाद की स्थिति उत्पन्न न हो तथा ऐतिहासिक सत्य निष्पक्ष रूप से सामने आ सके।
इस संबंध में श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा द्वारा माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी, भारत सरकार तथा गुजरात सरकार को पत्र लिखकर इस प्रकरण की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने, प्राप्त प्रतिमाओं एवं शिलालेखों के संरक्षण तथा ऐतिहासिक तथ्यों को सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
महासभा के पदाधिकारियों ने भारत सरकार, गुजरात सरकार एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से मांग की है कि—
1. भरूच स्थित उक्त स्थल की वैज्ञानिक एवं निष्पक्ष पुरातात्विक जांच कराई जाए।
2. प्राप्त जैन प्रतिमाओं, शिलालेखों एवं अन्य पुरावशेषों की वैज्ञानिक जांच एवं विशेषज्ञों द्वारा उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि कराई जाए।
3. जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए, ताकि देशवासी एवं जैन समाज वास्तविक तथ्यों से अवगत हो सकें।
4. जांच पूरी होने तक स्थल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए तथा किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ या अवैध निर्माण पर रोक लगाई जाए।
5. यदि जांच में यह सिद्ध होता है कि यह स्थल मूल रूप से जैन धार्मिक विरासत से संबंधित है, तो उसके ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्वरूप की पुनर्स्थापना के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।
महासभा ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की संस्कृति सहिष्णुता, सद्भाव और पारस्परिक सम्मान की संस्कृति रही है। इतिहास से जुड़े ऐसे संवेदनशील विषयों पर सभी पक्षों को संयम, शांति एवं जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करना चाहिए। किसी भी प्रकार की उत्तेजना, अफवाह या सामाजिक वैमनस्य को बढ़ावा देना राष्ट्रहित में नहीं है। सत्य की स्थापना केवल प्रमाणों, शोध एवं न्यायपूर्ण प्रक्रिया के आधार पर ही होनी चाहिए।
जैन समाज सदैव से अहिंसा, सत्य एवं सह-अस्तित्व का उपासक रहा है। इसलिए समाज की यह मांग किसी विवाद को जन्म देने के लिए नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य के संरक्षण, भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के सम्मान तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से है। यदि भरूच की यह खोज प्रमाणित होती है, तो यह केवल जैन समाज ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की सांस्कृतिक विरासत के लिए गर्व और गौरव का विषय होगा।
महासभा ने आशा व्यक्त की कि संबंधित सभी सरकारी एवं पुरातात्विक संस्थाएं निष्पक्षता, पारदर्शिता एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ इस विषय की जांच कर देश के समक्ष सत्य प्रस्तुत करेंगी।

पवन जैन गोधा
श्री भारतवर्षीय दिगम्बर जैन महासभा (धर्म संरक्षिणी)-राष्ट्रीय महामंत्री

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