चातुर्मास को सार्थक बनाए

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चातुर्मास को सार्थक बनाए
— महावीर दीपचंद ठोले, छत्रपति संभाजी नगर 7588044495
प्रस्तावना
प्रतिवर्ष की भाँति चातुर्मास पुनः हमारे द्वार पर उपस्थित है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, साधना, स्वाध्याय और समाज-निर्माण का महापर्व है। आज आवश्यकता इस बात की है कि चातुर्मास को ऐतिहासिक गरिमा, आध्यात्मिक गहराई और सामाजिक उपयोगिता के साथ संपन्न किया जाए। श्रमण, श्रावक, विद्वान, समाजसेवी, संस्थाओं के पदाधिकारी और दानवीर सभी मिलकर ऐसा चिंतन करें जिससे धर्म और समाज दोनों का स्थायी कल्याण हो।
चातुर्मास का ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक महत्व
चातुर्मास भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का एक प्राचीन एवं प्राकृतिक पर्व है। यह आत्मशांति, साधना और आत्मनिरीक्षण का अवसर प्रदान करता है। प्राचीन काल में मुनिगण वर्षायोग के दौरान वन, पर्वत, गुफाओं और एकांत स्थलों में निवास कर तप, ध्यान और स्वाध्याय करते थे।
सौराष्ट्र की गिरनार स्थित चंद्रगुफा, श्रवणबेलगोला की आचार्य भद्रबाहु गुफा, उड़ीसा की उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँ तथा अन्य अनेक स्थान इसके प्रमाण हैं। इन स्थानों पर केवल साधना ही नहीं हुई, बल्कि जैन साहित्य की अमूल्य निधि का भी सृजन हुआ। षट्खंडागम, महाधवला जैसे महान ग्रंथों का लेखन और संरक्षण इसी परंपरा की देन है।आचार्य आदिसागर, आचार्य शांतिसागर, आचार्य वीरसागर, आचार्य चंद्रसागर, आचार्य देशभूषण आदि महान संतों के चातुर्मास जहाँ होते थे, वे स्थान तीर्थ बन जाते थे। वहाँ धर्म, संस्कृति, सेवा और विकास का वातावरण निर्मित होता था।
चातुर्मास की मूल भावना
जैन आगमों के अनुसार वर्षायोग का समय कषाय रूपी अग्नि को त्याग, वैराग्य, स्वाध्याय और ध्यान के द्वारा शांत करने का काल है। यह आत्मशुद्धि का अवसर है। श्रावक भी इस अवधि में शास्त्र-अध्ययन, गुरु-सान्निध्य और आत्मचिंतन द्वारा अपने जीवन को दिशा देते हैं।
वर्षाकाल में व्यापारिक गतिविधियाँ कम होने से समाज को भी आध्यात्मिक उन्नति के लिए पर्याप्त समय मिल जाता था। इस प्रकार चातुर्मास साधु और श्रावक दोनों के लिए साधना और संस्कार का श्रेष्ठ अवसर था।
वर्तमान स्थिति : चिंता के विषय
आज दुर्भाग्यवश चातुर्मास की मूल भावना कहीं-कहीं धूमिल होती दिखाई देती है। कई स्थानों पर इसकी सफलता का मापदंड धर्म-साधना के स्थान पर धनसंग्रह,भीड़-संग्रह, भव्य मंच, विशाल जुलूस और प्रदर्शन बन गया है।वितरागता और अपरिग्रह के प्रतीक संतों का मूल्यांकन भी कभी-कभी बाहरी वैभव और आर्थिक शक्ति के आधार पर होने लगा है लाखों करोड़ों रुपये के बजट, विशाल प्रचार-प्रसार और प्रतिस्पर्धा की भावना से सामान्य समाज पर अनावश्यक बोझ पड़ता है।
प्रश्न यह है कि क्या चातुर्मास का उद्देश्य केवल आयोजन की भव्यता है, या आत्मोन्नति और समाजोत्थान?
चातुर्मास को सार्थक बनाने के उपाय
1. आडंबर से अधिक उपयोगिता
चातुर्मास में प्रदर्शनात्मक गतिविधियों के स्थान पर दीर्घकालीन लाभ देने वाले कार्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
2. धार्मिक शिक्षा का प्रसार
बालकों, युवाओं और नई पीढ़ी को जैन दर्शन, संस्कृति और नैतिक मूल्यों से जोड़ने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित हों।
3. सामाजिक सुधार
अंधविश्वास, रूढ़ियों, मृत्यु भोज, अपव्यय और अन्य सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जागरण अभियान चलाए जाएँ।
4. सेवा कार्य
चातुर्मास में कम से कम लागत से अधिकाधिक धर्म प्रभावना होकर बचत राशि से समाज को ठोस व स्थायी उपलब्धि प्राप्त हो| स्कूल कॉलेज खुले, विशाल बहुउफयोगी अस्पताल खुले|असहाय, गरीब एवं जरूरतमंद लोगों
की सहायता हेतु स्थायी निधि (फंड) का निर्माण हो।
5. युवाओं को जोड़ना
युवाओं के मंदिरों और साधु-संतों से दूर होने के कारणों पर गंभीर चिंतन हो तथा उन्हें धर्म से जोड़ने के व्यावहारिक प्रयास किए जाएँ।
6. प्राचीन तीर्थों का संरक्षण
जहाँ नए मंदिर बन रहे हैं, वहीं उपेक्षित प्राचीन जैन तीर्थों, मंदिरों और धर्मस्थलों के संरक्षण पर भी ध्यान दिया जाए। कई ऐसे तीर्थ हैं जहाँ पूजा-अर्चना तक बंद हो चुकी है। वहाँ चातुर्मास आयोजित कर उन्हें पुनर्जीवित किया जा सकता है।
साधना ही मोक्ष का मार्ग
धर्म की आत्मा केवल पत्थरों और इमारतों में नहीं, बल्कि आचरण में बसती है। वर्तमान में भी महानतपस्वी, ज्ञानी और प्रभावशाली श्रमणों की कमी नहीं है, किंतु समय की प्रतिस्पर्धा और प्रदर्शन की प्रवृत्ति कहीं-कहीं मूल उद्देश्य को पीछे छोड़ देती है।
मंच, माइक, मोबाइल, मठ और मानपत्र जैसे आकर्षण साधना के मार्ग में बाधक न बनें। यह स्मरण रखना होगा कि मोक्ष साधनों से नहीं, साधना से प्राप्त होता है।
चातुर्मास को “चिंतन मास” बनाएं
चातुर्मास को केवल आयोजन नहीं, बल्कि चिंतन, आत्मनिरीक्षण और आत्मविकास का पर्व बनाया जाए। दूसरों के गुणों और अपने दोषों का अवलोकन किया जाए। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र को जीवन में उतारने का प्रयास हो।यदि चातुर्मास सादगी, साधना, स्वाध्याय और समाज-सेवा के साथ संपन्न होगा, तभी वह वास्तव में जैन दर्शन के अनुरूप कहलाएगा
उपसंहार
आज आवश्यकता है कि साधु और श्रावक मिलकर चातुर्मास की मूल भावना पर पुनः विचार करें। धर्म की प्राचीन गौरवशाली परंपरा को जीवित रखते हुए वर्षायोग को पुनः आत्मकल्याण और लोककल्याण का माध्यम बनाया जाए।जहाँ चाह होती है, वहाँ राह भी निकलती है। अंधकारमय रात्रि के बाद सूर्य का उदय निश्चित है। यदि हम संकल्प लें, तो चातुर्मास पुनः जैन संस्कृति, साधना औरसमाज-जागरण का स्वर्णिम पर्व बन सकता है।
— महावीर दीपचंद ठोले
महामंत्री, छत्रपति संभाजीनगर
श्री भारतवर्षीय दिगंबर जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा (महाराष्ट्र)

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