बिना योग्य शिष्य बने योग्य गुरु नहीं बन सकते:वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नदी गुरुदेव :
रिपोर्ट अजीत कोठिया डडूका
भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में आचार्य श्री कनक नंदीजी गुरुदेव ने बताया कि विवेकवान व शांतचित्त होकर प्रत्येक धार्मिक क्रियाएं करनी चाहिए। बिना विद्यार्थी बने गुरु नहीं बन सकते। पहले योग्य शिष्य बनना पड़ेगा उसके बाद योग्य गुरु बन सकते हैं। एक ही जमीन में विभिन्न बीज बोने पर बीज के अनुसार वृक्ष बनेंगे वैसे ही स्वयं के गुण के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्माण होगा। आत्मा ही स्वयं को जन्म से लेकर निर्वाण तक ले जाता है। शिष्यत्व गुण प्रगट नहीं होगा तब तक सम्यक दृष्टि नहीं बन सकते हैं। हमारे अंदर भी शिष्यत्व गुण प्रकट नहीं हुआ था अतः हम आत्म ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा नहीं कर पाए। शिष्यत्व स्वयं में ही आता है। स्वयं बीज ही पौधा बनता है मिट्टी नहीं वैसे ही स्वयं ही भाव के अनुसार ही शिष्य बन सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से आत्मा को जानो। आत्मा की आराधना करो। आध्यात्मिक दृष्टि से स्वयं की आत्मा को महत्व दिया गया है। साधु चक्रवर्ती का भी शासन नहीं पालते। धर्म स्व केंद्रित है। स्वयं का गुरु स्वयं है। प्रेम सौहाद्र आदि गुण स्वयं की आत्मा में ही है। गुरुत्व शिष्यत्व गुण तुम्हारे अंदर ही है, तुम स्वयं हो। एक अक्षर मै का ज्ञान ही संपूर्ण ज्ञान है। अभव्य में आत्मगुण, शिष्यत्वगुण प्रकट नहीं हुआ है। अनादिकालीन अग्रहित मिथ्यात्व के कारण मै शब्द का ज्ञान आत्मा का ज्ञान यह जीव नहीं कर सकता। स्वयं शिष्य नहीं बने तब तक जीव स्वयं को नहीं जान सकता। सब्जी का टेस्ट चम्मच को नहीं आता वैसे ही मिथ्या दृष्टि को आत्मा का सुख अनुभव में नहीं आता। जो स्वार्थी होता है वह आध्यात्मिक नहीं हो सकता।
मुनि श्री सुविज्ञ सागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता आत्मा ही स्वयं को ले जाता है जन्म से लेकर निर्वाण तक।द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।












