अंतरदीप जलाने का पर्व है दीपावली

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महावीर दीपचंद ठोले औरंगाबा(महा)
महामंत्री श्री भारतवर्षीय दि जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा (महाराष्ट्र प्रांत)
75 880 44495
भारतीय जैन संस्कृति मे दीपावली त्याग और संयम का पर्व है। सांसारिक पर्व के साथ-साथ अध्यात्मिक संदेश भी इस पर्व में छुपा है ।परंतु आज समाजने त्याग के ईस पर्व को ही भोग और परिग्रह का पर्व बना दिया है।आवश्यकता है हमें अपनी आत्मज्योति को प्रज्वलित करने की ।अपना दीपक स्वयं को ही बनना है। आत्मा को ही दीपक बनाकर उसे जगमगाए।उसके लिए जरूरी है आत्मविश्वास।
प्रायःआजकल लोग दीपावली को मात्र बाह्य प्रसंगोसे जोड़कर यह त्योहार मनाने को सार्थकता मान लेते हैं ।परंतु प्रकाश पर्व के ऊन आन्तरिक संदेशों को हम भूल जाते हैं जो हमें अपने आत्मा में निहित ज्ञान रूपी प्रकाश को आलोकित करने की प्रेरणा देते हैं,
तमसो मा ज्योतिर्गमय
का उपदेश देते हैं की अज्ञान रुपी अंधकार को मिटाकर हमे विश्व को ज्योतिर्मय करना है ।
कार्तिक कृष्ण अमावश्या को जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भ महावीर को निर्वाण की प्राप्ति हुई ।तबसे आज तक दीपावली पर्व मनाया जाता है ।निर्वाण पद की प्राप्ती आसक्ति से नहीं विरक्ती से होती है ।भोग से नहीं त्याग से होती है ।और वासना से नहीं साधना से होती है। परंतु हम इस पर्व के अध्यात्मिक संदेश को भूलकर मात्र सांसारिक और शारीरिक कामनाओं की तृप्ती में ही लिप्त हो रहे हैं यही विडम्बना है ।आज के सभी सांसारिक आयोजन हमारी आत्मा के अज्ञान रुपी अंधकार के ही पोषक एवं सूचक है।
आज के एक्कसवी सदी के इस भौतिक युग में चारों ओर भय, प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत स्वार्थो की अंधेरी दीवारें हैं। आतंकवाद , हिंसा, प्रदूषण ,भ्रष्टाचार, अनैतिकता आदि समस्याऐ मनुष्य के सामने चुनौती बनकर खड़ी है। इन समस्याओं का हल तब तक नहीं हो सकता जब तक मनुष्य अनावश्यक हिंसा को छोड़ने का प्रण नहीं करता ।इस मोह के अंधकार को भगाने के लिए अन्तर दीप जलाना होगा ।हमारे भीतर आज्ञान का तमस छाया हुआ है वह ज्ञान के प्रकाश से मिट सकता है। ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाश दीप है। जब ज्ञान का आत्म रूपी दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं ।इस आत्म रूपी दीपक की प्रज्वलित अखंड ज्योति से मनुष्य शाश्वत सुख, शांति एवं आनंद को प्राप्त हो सकता है।
दीपावली पर्व संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक है। यह पर्व आत्मविश्वास और ज्ञान प्रकाश का उत्तम अनुष्ठान है। यह सामाजिक और धार्मिकता से ओतप्रोत पर्व है। दीपावली ग्यानरूपी प्रकाश , राष्ट्रीय एकता एवं प्राणी मात्र के प्रति सद् भावना को प्रकट करती है। जैसे दीपक में रूई
और तेल अपने वर्चस्व को मिटाकर दूसरों को प्रकाशित करता है ,इसी भाती मनुष्यने भी अपने गुणो और स्नेह के माध्यम से दूसरों के प्रति हितकारी होना चाहिए। स्वयं जलकर दूसरों को प्रेम का,सद्भावना का
प्रकाश देना चाहिए ।
भगवान महावीर सत्य, अहिंसा, एवं चरित्र निर्माण के जो उपदेश है उन्हें जीवन में धारण करने की प्रेरणा देते हैं ।इस धार्मिक परंपरा के कारण दीपावली का पर्व अपुर्व श्रद्धा, भक्ति और आनंद के साथ मनाया जाता है । इस अवसर पर हमें अपने विकारों को त्याग कर मन को शुद्ध बनाना है तथा ज्ञानोपयोग का दीपक प्रकाशित करना है ।हमें अंदर से क्रोध, मान, माया, लोभ को निकाल कर ज्ञान रूपी दीपक का प्रकाश करना है ।यदि हम ऐसा करते हैं तो दीपावली मनाना सार्थक होगा।
हम भगवान महावीर को तो मानते हैं परंतु उनकी “जियो और जीने दो” की बात नहीं मानते। आज हमारा खान-पान, पहनावा, उत्सव सभी हिंसक होते जा रहे हैं ।इस महान अहिंसक पर्व पर आतिशबाजी के प्रयोग से हिंसा का तांडव हो रहा है। असंख्य सूक्ष्म एकेन्द्रीय से लेकर सैनि पंचेेंद्रीय जिवो की हत्या हो रही है। प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए अग्नि में नष्ट हो रहे हैं। क्या यही हमारे मानसिकता है।
दीपावली के अवसर पर हमारा कर्तव्य है की इस हिंसक परंपरा को छोड़कर स्वच्छ एवं अहिंसक परंपरा का आरंभ करें ।हिंसा के अंधकार को हमेशा के लिए त्याग कर दे। जिससे हमारा और समाज का जीवन प्रकाश पुंज हो जाएगा।
हम दीपावली बड़े हर्षोल्लास से, मौज मस्ती से मनाते हैं। परंतु हमारे पड़ोस में एक ऐसा वर्ग भी है जिनको यह पता भी नहीं चलता कि दीपावली कब आती है ,कब जाती है उनको ना दीपावली की रोशनी का एहसास होता है और न दिए के लौ का। उनकी दोपहर भूखे पेट कटती है और रात अंधेरे में ।ना उन्हें खाने को मीठा मिलता है, न त्योहार के नए कपड़े मिलते हैं ।इनमें से कुछ प्रकृति के मार से तो, कुछ अपनों की मार से मारे हुए है। अतः हमारा कर्तव्य बनता है कि उन भाई बहनों के पास जाकर उनके घरों में दीपको का प्रकाश करना होगा। उनके भूखे, प्यासे बच्चों की भूख को मिटाना होगा। हमने इन बेचारे जो आर्थिकता के ठंड से सिसक रहे हैं, दुखी है उनकी झोपड़ी में जाकर स्नेह का ,प्रेम का एक छोटा सा भी दीपक प्रज्वलित कर उनके अंधकार मयी जीवन को प्रकाशित किया तो हमारी दीपावली मनाना सार्थक होगी ।
भगवान महावीर ने जीवन भर मूर्छित मानव को जिलाया, जीवन के अंधेरे को काटने वाली जीवन मूल्यों की मशाल थमाई ,आस्था के ऐसे दीपस्तंभ प्रदान किये जिस पर रखें चौमुखी दीपों से “जियो और जीने दो”, “परस्परोपग्रहो जीवानाम् “,”अंहिसा परमो धर्म”, आदि की सप्तरंगी आभा प्रस्फुटित की,ऐसे समय दीपावली संकेत देती है कि हमारे आत्मा मे दया धर्म का दीप आलोकित करें, ज्ञान का प्रकाश करें, और दानवता को समाप्त कर अहिंसा ,सेवा और त्याग के विकास पद पर अग्रसर होकर करुणा, दया से मानवता का वरण कर भगवान बनने की ओर पग अग्रसर करें और जीवन को धर्म से प्रकाशित कर संपूर्ण देश ,राष्ट्र, समाज व धर्म में अहिंसा धर्म का दीप जलाने का प्रयास कर सच्ची दीपावली मनाऐ और दीपपर्व सर्वत्र अलोकमयी करें ।
अतः हम सबके जीवन में यह दीपावली पर्व मंगलमयी, खुशमयी हो। सुख ,समृद्धि, लक्ष्मी, यश,वैभव का एक और दीप प्रज्वलित हो ।इसी मंगल भावना के साथ
*दिए की रोशनी और खुशियों की बहार।
मुबारक हो आपको दीपावली का त्यौहार।

श्री संपादक महोदय,
सा जयजिनेद्र,
आनेवाले 14 नवम्बर को दीपावली के अवसर पर यह आलेख पत्रिका मे प्रकाशित कर उपकृत करे। धन्यवाद।
दीपावली की अग्रिम शुभ कामनाए।
महावीर दीपचंद ठोले,औरंगाबाद (महा) महामंत्री श्री भारतवर्षीय दि जैन तीर्थ संरक्षिणी महासभा महाराष्ट्र प्रांत 7588044495

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