आगम रूपी समुद्र का 7 तत्वों आत्म चिंतन एवं स्वाध्याय से मंथन करने पर ज्ञान रूपी अमृत मिलता है…..आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

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आगम रूपी समुद्र का 7 तत्वों आत्म चिंतन एवं स्वाध्याय से मंथन करने पर ज्ञान रूपी अमृत मिलता है…..आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
सीकर (       ) राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज दंग की नसिया बजाज रोड सीकर में संघ सहित विराजित हैं। सोलह कारण भावना प्रवचन माला के अंतर्गत मंगलवार को अभीक्ष्णज्ञानोपयोग भावना के संबंध में विवेचना की गई । आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने बताया कि अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावना का सरल भाषा में आशय यह हैं कि स्वाध्याय से निरंतर सम्यक ज्ञान में उपयोग लगाने से आत्मा का हित होता हैं चुकी मन ,उपयोग चंचल होता है इसलिए तत्व का आत्मज्ञान एकाग्रता से करना चाहिए ज्ञान आपका तीसरा नेत्र है ज्ञान से पाप का नाश होता है, मोक्ष लक्ष्मी प्राप्त करने के लिए ज्ञान माध्यम है ,मोक्ष सुख केलिए धर्म पुरुषार्थ करना पड़ता है तभी नवनीत रूपी मोक्ष प्राप्त होता है। राजेश पंचोलिया के अनुसार आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि आगम रूपी समुद्र का स्वाध्याय से मंथन करने पर ज्ञान रूपी अमृत मिलता है आगम भगवान की वाणी है ज्ञान से संसार परिभ्रमण छूट सकता है इसलिए ज्ञान का सदुपयोग करना चाहिए लौकिक सुख वास्तविक नहीं है शाश्वत सुख वही है जो संसार परिभ्रमण जन्म मरण से छुटकारा दिला दे ज्ञान से बुद्धि मिलती है तभी पुण्य रूपी फल मिलते हैं निरंतर स्वाध्याय से लक्ष्य मनोरथ की प्राप्ति होती है इसके पूर्व आर्यिका श्री दिव्ययश मति माताजी ने बताया कि महापुरुषों का मार्ग श्रेष्ठ होता है उनके गुणों को प्राप्त करने के लिए उनके मार्ग का अनुसरण करना चाहिए संयम साधना के साथ भावना भी शुद्ध होना चाहिए आत्मा व्रज के समान कठोर और पुष्प से भी कोमल होती है इसे स्पष्ट करते हुए बताया कि जब आत्मा कठोर तप करती है तब वह वज्र के समान कठोर हो जाती है और प्राणी को  जब करुणा उपदेश देते हैं ,तब वह फूलों से भी कोमल हो जाती है  सभी को अणुव्रत महाव्रत का निर्दोष पालन करना चाहिए पूज्यपाद स्वामी ने सर्वार्थ सिद्धि ग्रंथ में आत्मा का उपयोग धर्म कार्य में लगाना बताया है,ज्ञान का निरंतर स्वाध्याय चिंतन से अज्ञान रूपी मोह अंधकार ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर होता है आपको यह चिंतन करना होगा कि  क्या छोड़ना है ,क्या ग्रहण करना है ज्ञान की सार्थकता इसी में है कि इससे दूसरे का हित  हो। सम्यक ज्ञान के अनेक गुण बताएं सौभाग्यशाली परिवारों द्वारा दीप  प्रवज्जलन कर आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की गई।

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