वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने अपने प्रवचनों में
पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा अंतरराष्ट्रीय वेबीनार में कृष्ण लेश्या के बारे में बताया कृष्ण लेश्या वाले लोग सुंदर पुष्प की तरह दिखने में सुंदर होते हैं परंतु अंदर में कोब्रा सर्प की तरह विषैले जो भावों में काले विध्वसंकारी होते हैं। वह असुर,नारकी, मांसभक्षी बनते हैं। चंड का अर्थ तीव्र क्रोध होता है।
अधिकांश कीडे मकोड़े कीट पतंगे मांसाहारी है। वायरस, क्रमी,बैक्टीरिया सब कफ, वीर्य, मांस का आहार करते हैं। जो क्रूर दुष्ट मायाचारी भ्रष्टाचार मिलावट करते हैं जो दुष्ट माता पिता के वश में भी नहीं रहते तीर्थंकर के वश में भी नहीं रहते ऐसे जीव मंदबुद्धि, ज्ञान संयम से रहित बुद्धि विहीन कुज्ञानी, विषय भोगो में आसक्त,आलसी दुष्ट, असुर वृत्ति वाले , स्वच्छंद कार्य करने में मंदं, जडबुद्धी मन में अशुभ भाव रखने वाले, अच्छे काम में आलसी, देखने में सुंदर व्यक्ति की तरह होते हैं परंतु अंदर भावों से काले होते हैं।
सर्प विष से क्रूर पशुओं को भी परास्त कर देता है अपने विष से जीवो की आंखों को प्रभावित करता है।
कृष्ण लेश्या वाले ऊपर से भद्र शालीन शांत सरल भी दिखते हैं परंतु ऐसे व्यक्ति घोर पापी होते हैं। ऐसे जीव धर्म करते हुए भी पाप करके नीच गतियो में भ्रमण करके बहुत दुख प्राप्त करते हैं.।
शुक्ला लेश्या वाले इष्ट में राग अनिष्ट मे वैरत्व नहीं करते, निदान रहित पूजा करते हैं सेवा करते हैं दान करते हैं। जैसे अंतरंग में होते हैं वैसे ही बाहर भी दिखाई देते हैं दया करुणा सहानुभूति से ओत प्रोत होते हैं।विनयवान होते हैं। व्यसनी, व्याभिचारी, कुशील नहीं होते हैं। सम्यक दृष्टि होते हैं। आत्मा से आत्मा में लीन होना सम्यक दर्शन है। सम्यक दर्शन आत्मा का स्वभाव है जीव का मूलभूत गुण है। शुक्ललेश्या वाले सदा गुरुओं की संगति करते हैं साधुओ को आहार दान देते हैं। निंदा नहीं करते हैं। शुभ भाव रखते हैं। थर्म को आचरण में लाते हैं अतः उच्च गति में देव मनुष्य बनते हैं।
मुनिश्री सुविज्ञ सागरजी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता
देखो देखो सर्वत्र देखो तन को देखो मन को देखो।
द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी श्रीमती
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी।













