बड़े-बड़े शूरमा दब गए समय के दबाव में..पत्थर भी रेत हो गए नदी के बहाव में..! अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज

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अंतर्मना आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागरजी महाराज की अहिंसा संस्कार पदयात्रा दिक्षा भुमी परतापुर बांसवाड़ा से नोगामा राजस्थान में विहार कर रही है और आज उसी श्रुंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य श्री ने कहा कि।                       अहो आश्चर्य  — कुएँ का पानी पीने वाले जिन साधु-साध्वियों ने समाज में पंथ के नाम पर ज़हर घोला था, आज वही समाज की एकता की बात कर रहे हैं।  है ना आश्चर्य की बात-?
चारों दिशाओं से श्रावकों के लिए जैन एकता के संदेश आ रहे हैं। श्रावक बेचारा सोच रहा है कि मैं किसके साथ एकता करूँ-?  श्रावक तो कल भी एक था और आज भी एक ही है।  हमें तो साधु-साध्वियों ने बाँटा, और आज वही एकता की बात कर रहे हैं।
श्रावक समाज में भेद किसने डाला-?  आज से 30-40 वर्ष पहले तक श्रावक समाज यह भी नहीं जानता था कि कौन किस पंथ के साधु हैं। मात्र पीछी, कमण्डल और उनकी नग्नता को देखकर सेवा-भक्ति में भाव-विभोर हो जाता था। हमारा मस्तक श्रद्धा से झुक जाता था और हृदय भक्ति से भर उठता था।
कुएँ का पानी पीने वाले साधु-साध्वियों ने, कुछ तथाकथित विद्वानों ने, और दिन में चार-पाँच बार स्वाध्याय करने वाले साधु-साध्वी एवं ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी बहनों ने शिविर लगाकर भोले श्रावक समाज को विभाजित कर दिया। स्वाध्याय और शिक्षण शिविरों के माध्यम से इस प्रकार की शिक्षाएँ दी गई  —
 केवल हमारे संघ के साधु ही सच्चे हैं, उनके अतिरिक्त कोई सच्चे साधु नहीं हैं।
 हमारे संघ के अतिरिक्त किसी अन्य संघ के साधु को नमस्कार न करें, नगर में न आने दें, मंदिर में स्थान न दें, आहार न दें, उनकी जय न बोलें, उनका चातुर्मास न कराएँ और उनके विहार में न जाएँ।
 अन्य संघ की आर्यिकाओं को नवधा भक्ति से आहार न दें। चाहे वे चंदनबाला हों, सीता हों, ब्राह्मी हों या सुन्दरी आर्यिका माताजी ही क्यों ना हो — वे भूखी आपके गृह-द्वार से लौट जाएँ, तो लौट जाने देना।
 जो भगवान की पूजा फल, फूल और नैवेद्य से करते हैं, वे जैन नहीं हैं। उन्हें साधर्मी न समझना।
 छठी शताब्दी से पूर्व के आचार्य और शास्त्र मान्य नहीं हैं। उनकी शिक्षाओं के अनुरूप आचरण करने वाले मिथ्यादृष्टि हैं। क्या-क्या शिक्षाएँ, क्या-क्या उपदेश हमें नहीं मिले! हम तो धर्मभीरु थे, देव-शास्त्र-गुरु के भक्त थे। हमको बाँटने वाले, भव-भव में रुलाने की शिक्षा देने वाले, अनंत संसार में भटकाने की शिक्षा देने वाले आज जैन एकता की बात कर रहे हैं। है ना आश्चर्य की बात-?
_किसी ने क्या खूब लिखा है —_वक्त जब आँखें फेर लेता है..तब शेर को कुत्ता भी घेर लेता है…!!! नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल

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