गलियाकोट पुनर्वास कॉलोनी सागवाड़ा में अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदीजी गुरुदेव ने बताया कि संसार मुख्यतः भाव से होता है वह भाव संसार है। विश्व अलग है संसार अलग है। संसार विश्व में ही होता है। जीव संसार में संसरण अर्थात जन्म मरण करते हैं। परिभ्रमण करते हैं संसार के पर्यायवाची शब्द द्रव्य संसार,क्षेत्र संसार, काल संसार, भव संसार, भाव संसार यह पांच प्रकार का संसार होता है यह हमारा स्वरूप नहीं है। जिस प्रकार पक्षी अलग-अलग स्थानो से आकर एक वृक्ष पर संध्या के समय विश्राम करते हैं तथा सुबह होते ही उड़ जाते हैं वैसे ही संसार में सभी जीव अलग-अलग गतियां से आते हैं कर्मों के अनुसार आयु के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं तथा कर्मों के अनुसार भावों के अनुसार गतियों में चले जाते हैं।
जिस प्रकार गाड़ी के नीचे चलने वाला कुत्ता समझता है कि मैं स्वयं गाड़ी को खींचकर ले जा रहा हूं वैसे ही संसारी जीव समझता है मैं ही संसार चला रहा हूं।
जैन धर्म में बताया गया है कि कर्मों के कारण अनादि काल से अनेक जन्मों के संबंध के कारण मोह के कारण यह जीव संसार में परिभ्रमण करता है। आचार्य श्री ने 18 नाते की कहानी भी बताइ। यह जीव किस प्रकार किसी का भाई किसी का पति किसी का मित्र किसी का देवर किसी का भतिजा आदि बन जाता है।
क्षेत्र संसार में इस जीव ने ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां पर जन्म मरण नहीं किया हो सभी क्षेत्रों में सूर्य चंद्र ग्रह उपग्रह पृथ्वी आदि सभी क्षेत्रों में जन्म मरण किया है। उत्सर्पीणी अवसर्पीणी सभी कालों का यह जीव साक्षी रहा है।अनंत बार यह जीव अनंत काल तक जन्म मरण करता आया है। यह काल संसार है.। इस जीव ने अनेकों पर्ययों को अनेक भवो तक प्राप्त किया है । कभी सर्प बना कभी नेवला कभी चींटी कभी हाथी कभी घोड़ा कभी पानी का जीव कभी अग्नि का कभी वायु का कभी पृथ्वी कभी वनस्पति के 10 लाख प्रकारों में अनेकों प्रकारों में जन्म लिया मरण किया यह भव परिवर्तन है। उन अलग-अलग गतियो में जीव ने अपने कर्म के अनुसार अपने भावों को किया भाव के अनुसार उसे गति प्राप्त होती है यह भाव परिवर्तन है। भिन्न भिन्न पर्यायों में भिन्न-भिन्न शरीर को धारण करके अलग-अलग द्रव्यों को ग्रहण किया है वह द्रव्य परावर्तन है। मां का जीव ही सांस बन सकता है पिता बन सकता है पति बन सकता है पुत्र बन सकता है। द्रव्य संसार में इस जीव ने अनंत भवो तक संसार में जन्म मरण किया है अनंत बार एक दूसरे के शरीर को खाया है संसार की समस्त द्रव्यों को अनंत बार खाया है भोगा है त्यागा है.। इसका चिंतन करना अपायविचय धर्म ध्यान है।
यह पंच परावर्तन है। पंच परावर्तन को मिटाने के लिए ही धर्म किया जाता है। सिद्ध बनने के बाद में पंच परावर्तन नहीं करना पड़ता है।
जो प्रमाण,नय,व आगम से सत्य को नहीं जानता है वह धर्म को नहीं जानता है। जाति स्मरण से भी सम्यक दर्शन होता है। जो अवधि ज्ञानी मुनिराज होते हैं वह आहार दान के समय अपना अवधि ज्ञान नहीं लगाते हैं।
भद्रावती से राजेंद्र जी पाटनी की जिज्ञासा का समाधान करते हुए आचार्य श्री ने बताया इस जीव ने अनादि काल से सभी कार्य कर लिए हैं परंतु अपनी आत्मा का हित एक बार भी नहीं किया। समय शक्ति होने पर पर हित भी करना चाहिए परंतु पहले आत्मा का हित करके स्वयं का दीपक जलाना चाहिए जिससे अन्य के बुझे हुए दीपक भी जल सकेंगे। श्रावक की 53 क्रियाओं में दान तथा पूजा मुख्य है यह सतत करते रहना चाहिए। गृहस्थ जीवन में श्रावक पाप ही करते रहते हैं उन पापों को धोने के लिए दान को प्रमुख किया गया है इसके बाद पूजा रखी गई है। स्वात्म चिंता उत्तम है.। परचिंता अधमा अधमा है। इस जीव ने अनादि काल से पर चिंता ही की है। एक बार भी अपने स्वयं की अपनी आत्मा की चिंता नहीं की। यह जीव दूसरों के लिए अनंत बार मरा है परंतु स्वयं के लिए एक बार भी नहीं मरा नहीं तो संसार भ्रमण नहीं करना पड़ता .।
आचार्य श्री कहते हैं स्वयं के उद्धार का चिंतन करो। आत्म प्रतिति करो आत्मज्ञान करो, आत्मध्यान करो समता को धारण करो।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता
मां मुझे सुनाओ मेरी स्व की कहानी मेरी निज की कहानी जो सर्वज्ञ प्रभु ने जो. जानी।
द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी सागवाड़ा निवासी
विजयलक्ष्मी गोदावत ने दी।
– अजीत कोठिया डडूका की रिपोर्ट

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