मुरैना/द्रोणगिरी (मनोज जैन नायक) मनुष्य जब संघर्ष करता है, तब वह विनम्र रहता है। लेकिन जैसे ही उसे पद, प्रतिष्ठा, धन या अधिकार मिलता है, कभी-कभी उसके भीतर यह भ्रम जन्म लेने लगता है कि अब उसे कोई रोकने वाला नहीं है। वह स्वयं को इतना स्वतंत्र समझ बैठता है कि सही और गलत का भेद ही भूल जाता है। उसे लगता है कि उसके द्वारा किए जा रहे अनुचित कार्यों को कोई नहीं देख रहा। वह छल करता है, अन्याय करता है, दूसरों का अधिकार छीनता है, अपने पद का दुरुपयोग करता है और यह मान लेता है कि वह सबकी नज़रों से बच गया है। परंतु यही उसकी सबसे बड़ी भूल होती है।
जैन विद्वत अंशुल जैन शास्त्री लिखते हैं कि याद रखिए, तुम्हारी दो आँखें हैं, लेकिन तुझ पर हज़ारों आँखें लगी हुई हैं। समाज देख रहा है, समय देख रहा है, इतिहास देख रहा है, और सबसे बढ़कर कर्म का अटल नियम सब कुछ देख रहा है। मनुष्य चाहे संसार की आँखों से बच जाए, लेकिन अपने कर्मों के परिणामों से कभी नहीं बच सकता।
पद का अहंकार मनुष्य की बुद्धि को ढक देता है। वह स्वयं को महान समझने लगता है, जबकि वास्तविक महानता पद में नहीं, बल्कि चरित्र में होती है। जो व्यक्ति अपने अधिकार का उपयोग सेवा के लिए करता है, वही सम्मान का अधिकारी होता है। लेकिन जो अधिकार का उपयोग दूसरों को दबाने, अपमानित करने या पीड़ा देने में करता है, उसका पतन निश्चित है।
दूसरों को गिराकर कोई कभी ऊँचा नहीं उठ सकता। दूसरों का हक़ मारकर कोई सच्चा सुख नहीं पा सकता। किसी की विवशता का लाभ उठाकर अर्जित की गई संपत्ति, प्रतिष्ठा या सफलता अधिक समय तक साथ नहीं रहती। समय का न्याय अत्यंत कठोर होता है; वह देर कर सकता है, लेकिन अंधेर कभी नहीं करता।
जो आज अपने पद के बल पर दूसरों को रुला रहा है, वही कल परिस्थितियों के सामने स्वयं असहाय खड़ा हो सकता है। जो आज अपने प्रभाव का दुरुपयोग कर रहा है, कल वही प्रभाव उसके किसी काम नहीं आएगा। इसलिए पद मिले तो विनम्र बनिए, प्रतिष्ठा मिले तो संयम रखिए और अधिकार मिले तो उसका उपयोग सेवा, न्याय और करुणा के लिए कीजिए।
जीवन का सबसे बड़ा पद मानवता है, सबसे बड़ी प्रतिष्ठा चरित्र है और सबसे बड़ी सफलता निर्मल अंतःकरण है।
इसलिए सदैव याद रखिए
“तेरी दो आँखें हैं, लेकिन तुझ पर हज़ारों आँखें लगी हुई हैं।
संसार से भले ही छिप जाओ, पर अपने कर्मों से कभी नहीं छिप सकते।
इसलिए ऐसा जीवन जियो कि जब समय तुम्हारा लेखा-जोखा लिखे, तो तुम्हारे कर्म ही तुम्हारी सबसे बड़ी सिफ़ारिश बन जाएँ।”
भाव लेखक
अंशुल जैन शास्त्री द्रोणागिरी anshuljain5164@gmail.com












