अपने बच्चों को आत्म ज्ञान नहीं देने वाले माता पिता उनके वेरी है:सिद्धांत चक्रवर्ती वैज्ञानिक धर्माचार्य कनक नंदी गुरुदेव

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आचार्य श्री कनक नंदीजी गुरुदेव ने भिलुडा के पास शिवगौरी आश्रम से अंतर्राष्ट्रीय वेबीनार में बताया कि सामान्य लोगों से साधुओं की विपरीत वृत्ति होती है। अपने बच्चों को आत्म ज्ञान नहीं देने वाले मात-पिता उनके वैरी हैं। दादा दादी मात पिता चाचा चाचा आदि परिवार के लोग ही दुश्मन है जिन्होंने इस जीव को आत्मज्ञान नहीं दिया। हम आत्मा को नहीं जानते थे अतः आत्मद्रोही थे।
चंद्रगुप्त मौर्य अंतिम श्रुत केवली को अपने 14 सपनों का फल पूछते हैं।
शेर से भी केंचुआ अनंत गुना अधिक पापी है। क्योंकि शेर मन सहित पंचेेंद्रीय जीव है. गुरु के उपदेश से वह सम्यक दर्शन ग्रहण कर सकता है परंतु केंचुआ नहीं।
भगवती आराधना ग्रंथ से आचार्य श्री ने बताया कि कारण वश साधु एक स्थान पर कम या अधिक दिन रह सकते हैं। चातुर्मास के बाद भी 30 दिन अधिक ठहर सकते हैं। वर्षा की अधिकता,शीत की अधिकता, गर्मी की अधिकता, महामारी आने पर, रोग होने पर प्राकृतिक आपदा आने पर युद्ध होने पर आतंकवाद आदि अनेक कारण होने पर साधु सुरक्षित एक स्थान पर रह सकते हैं। स्वाध्याय करने के लिए ज्ञानार्जन करने के लिए विहार भी कर सकते हैं तथा एक स्थान पर अधिक निवास भी कर सकते हैं। शास्त्र अध्ययन शास्त्र पठन पाठन, लेखन उनके निवास विहार में मुख्य कारण है। शिक्षा दीक्षा अध्ययन शास्त्र लिखने के लिए दक्षिण भारत से दो मुनिराजो को गुजरात बुलाया उसके बाद उनको पढ़ाया सिखाए परीक्षा के बाद शास्त्र लेखन का आदेश आचार्य श्री धरसेनाचार्य ने दिया। उसमें उन्हें कई वर्ष लगे।
शक्ति के अभाव में भी एक स्थान पर साधु रह सकते हैं। उत्कृष्ट समाधि के लिए भी एक स्थान पर रह भी सकते हैं और विहार भी कर सकते हैं साधु को उत्कृष्ट समाधि में कई महीने,12 वर्ष भी लगते हैं। समाधिस्थ रोगी साधु की सेवा, वैयावृत्ति करने के लिए अधिक समय रह सकते हैं। वैयावृत्ति करना शिखर बंदी मंदिर बनाने से भी अधिक पुण्यबंध का कारण है। महामारी होने दुर्भिक्ष होने पर अतिवृष्टि अनावृष्टि होने पर साधु एक स्थान पर रह भी सकते हैं और विहार भी कर सकते हैं।
उत्तर भारत में दुर्भिक्ष पड़ने पर 12000 साधुओ को लेकर आचार्य भद्रबाहु स्वामी साधुओं की सुरक्षा के लिए दक्षिण भारत गए।
कोई कारण होने पर चातुर्मास के बीच में भी विहार कर सकते हैं। संघ में किसी प्रकार का किसी साधु को साध्वि को कष्ट होने पर चातुर्मास के बीच में विहार कर सकते हैं। आत्मविराधना, रत्नत्रय विराधना ना हो ऐसे स्थान पर रहते हैं। एक स्थान पर महिनो रह सकते हैं। तथा समस्या होने पर चातुर्मास के बीच में भी जा सकते हैं।
रत्नत्रय की विराधना ना हो अतः शरीर रूपी नौका को सुरक्षित रखते हैं।
धन कमाकर स्वर्ग मोक्ष नहीं मिलेगा धर्म से ही स्वर्ग मोक्ष मिलेगा।
अभी के साधु भ्रूण अवस्था में है उनकी सुरक्षा सेवा व्यवस्था आहार विहार आदि में सुरक्षा हम श्रावकों का कर्तव्य है। जिस प्रकार भ्रूण,भ्रूण अवस्था में ही टूट जाएगा सुख जाएगा तो वृक्ष नहीं बन पाएगा वैसे ही मोक्ष रूपी वृक्ष के साधु भ्रूण है। बच्चों को शिशु अवस्था में खाना पानी पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है वह जवान मनुष्य की तरह कार्य नहीं कर सकता। जिस प्रकार मां अपने बच्चों की देखभाल करती है बचपन में नीचे गिर जाते हैं लग जाती है बीमार हो जाते हैं। भोजन बनाते समय तथा घर के कार्य करते समय भी मां अपने बच्चों का ख्याल रखती है वैसे ही साधुओं की सेवा सुरक्षा हर पल करनी चाहिए। यह श्रावकों का मुख्य कर्तव्य है। साधु ही बीज रूप में भगवान है। जिस प्रकार मां अपने बेटे को भोजन कराती है तो ध्यान रखती है कि बेटे के लिए क्या पथ्य है क्या अपथ्य है साधु रुग्ण ना हो, वह स्वस्थ रहे, ध्यान,अध्ययन अच्छा कर सके इस प्रकार वात्सल्य से श्रावकों को साधु को आहार देना चाहिए।
मुनि श्री सुविज्ञ सागर जी ने आचार्य श्री द्वारा रचित कविता
पंच परमेष्ठी तेरे भक्त हम तेरी भक्ति से बने भगवान तेरा ध्यान करें,तेरा ज्ञान करें, करे तेरा ही चिंतन मनन,पंच परमेष्ठी तेरे भक्त हम।.
द्वारा मंगलाचरण किया। ये जानकारी
विजयलक्ष्मी गोदावत सागवाड़ा ने दी
– रिपोर्ट अजीत कोठिया डडूका

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